बीएड फीस को लेकर कॉलेजों की अवैध वसूली ही नहीं बल्कि लखनऊ विश्वविद्यालय के लगातार विरोधाभासी आदेश भी अभ्यर्थियों के लिए मुसीबत खड़ा कर रहे हैं। काउंसलिंग शुरू होने के बाद से अब तक जीरो फीस को लेकर लविवि प्रशासन लगातार नई सफाई पेश कर रहा है। इस बार स्पष्टीकरण अल्पसंख्यक छात्रों के संबंध में है। कहा गया है कि इन छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति भी राजकीय दर पर ही होगी।
लविवि प्रशासन ने कहा था कि बीएड में एक लाख से कम आय वर्ग वाले समस्त संवर्ग के अभिभावकों के पाल्यों को शून्य फीस की सुविधा मिलेगी। काउंसलिंग सेंटर पर आय प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने वाले अभ्यर्थियों को जीरो फीस की रसीद देकर कॉलेज में दाखिला लेने भेज दिया गया। जब छात्र वहां पहुंचे तो कॉलेजों ने लाभ देने से इनकार कर दिया। छात्रों की शिकायतों पर लविवि प्रशासन ने फिर आदेश दिया कि सामान्य संवर्ग एवं ओबीसी के अभ्यर्थियों को केवल राजकीय दर से फीस प्रतिपूर्ति मिलेगी, जबकि अल्पसंख्यक एवं एससी/एसटी संवर्ग के अभ्यर्थियों की पूरी फीस माफ होगी। राजकीय दर मात्र १,५५८ रुपए ही है। अब विश्वविद्यालय ने जीरो फीस को लेकर फिर नया आदेश जारी किया है। अखबारों में दिए विज्ञापन में लविवि प्रशासन ने सफाई दी है कि बीएड में अल्पसंख्यक छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति भी राजकीय दर पर ही होगी, केवल एससी एवं एसटी अभ्यर्थियों की ही पूरी फीस माफ होगी। इसके लिए २९ जून, १० के शासनादेश का हवाला दिया गया है। सवाल यह है कि जब आदेश डेढ़ महीने पहले आ चुका था तो फिर उसके बाद जीरो फीस को लेकर क्यों गलतफहमी पैदा की गई। अब इस नए आदेश से छात्रों के लिए फिर मुसीबत खड़ी हो गई है(अमर उजाला,लखनऊ,25.8.2010)।
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