हिन्दी सरकारी प्रयासों से नही बची है, बल्कि संतों एवं साहित्यकारों के प्रयास से आज हिन्दी हमारे सामने बची है। आज हमारी भावी पीढ़ी जो भाषा सीख रही है, वह न तो शुद्ध रूप से अंग्रेजी है और न ही हिन्दी, वह खिचड़ी भाषा सीख रही है। इसके दोषी कोई और नही बल्कि हम लोग हैं। यह बातें प्रसिद्ध साहित्यकार कैलाश चंद्र पंत ने हिन्दी भवन में आयोजित सत्रहवीं पावस व्याख्यामाला के अंतिम दिन रविवार को हिन्दी की सार्वभौमिक स्वीकार्यता और संभावनाएं विषय पर बोलते हुए कही। उन्होंने कहा कि सरकार के प्रयास आज हमारे सामने हैं कि किस प्रकार से आजादी के बाद हिन्दी को राजभाषा का दर्जा तो प्रदान कर दिया, लेकिन 15 वर्ष के लिए अंग्रेजी को लागू कर हिंदी को वनवास दे दिया गया है। आज भी हमारी किताबों में यह लिखा हुआ है कि भारत एक उपमहाद्वीप है। यह भारत को तोड़ने वाले अंश को आज भी लड़के पढ़ते आ रहे हैं। सार्वभौमिकता की बात यह है कि लोगों के अन्दर भाषा प्रेम ही खत्म हो गया है। त्याग की बात करना बेमानी होगी। इस अवसर पर विशिष्ट वक्ता डा. विशेष गुप्ता ने कहा कि हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है, जो विश्व को एक में जोड़ सकती थी, पर आज यह अपने जन्म स्थान पर ही प्रवास के दौर से गुजर रही है। अगर सरकार और यहां के लोग इस पर ईमानदारी से सोचें तो यह संभव हो सकता है। इस अवसर पर विश्र्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि हिन्दी के समानांतर किसी अन्य भाषा को संवैधानिक मान्यता प्रदान करना ही हिन्दी को कमजोर करने का कारण है। इसे रोकने की जरूरत है। हिन्दी राजभाषा तो बन गई पर आज भी सरकारी या प्राईवेट दफ्तरों से गायब है। यही हाल रहा तो 20 वर्ष बाद हिन्दी वही लोग समझेंगे या बोलेंगे जो निरक्षर होंगे। आज सबसे बड़ा संकट यह है कि क्षेत्रीय भाषाएं हिन्दी की प्रतिद्वंदता में खड़ी हो गई है। सरकार अगर हिन्दी के लिए कुछ करती है, तो अन्य भाषाई जनता विरोध करने लगती है और सरकार वोट बैंक के डर से चुप हो जाती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि हिन्दी की सार्वभौमिकता का इतिहास बहुत ही पुराना रहा है। यही देखकर अंग्रेजों ने सबसे पहले हिन्दी को कमजोर करने का काम किया। उसके बाद अपने राज्य को मजबूत किया(दैनिक जागरण,भोपाल,2.8.2010)।
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