कर्मचारियों की संख्या के मामले में सरकारी बैंक भी अब निजी व विदेशी बैंकों की राह चल पड़े हैं। वे भी अब उतने ही कर्मचारी रख रहे हैं जितने जरूरी हैं। पिछले पांच वर्षो में 20 राष्ट्रीयकृत बैंकों में से 10 ने कर्मचारियों की संख्या में दो फीसदी से लेकर 20 फीसदी तक की कटौती की है। भारतीय बैंकों की ताजातरीन स्थिति पर रिजर्व बैंक की पिछले हफ्ते जारी रिपोर्ट के मुताबिक बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, केनरा बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन बैक, पंजाब व सिंध बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, यूको बैंक और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया ने अपने कर्मचारियों की संख्या काफी कम कर दी है। वर्ष 2005-06 से लेकर वर्ष 2009-10 के बीच बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारियों की संख्या 42,206 से घटकर 39,202 रह गई है। यानी 7 फीसदी से ज्यादा की कमी। केनरा बैंक के कर्मचारियों की संख्या 7.5 फीसदी कम होकर 43,380 रह गई है। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारियों की संख्या इस दौरान 40,124 से घटकर 32,140 रह गई है। यानी 19.89 फीसदी की कमी। पीएनबी ने भी कर्मचारियों की संख्या में आठ फीसदी की कमी की है। जबकि इंडियन बैंक ने लगभग नौ फीसदी की कटौती की है। और तो और सरकारी क्षेत्र के सबसे प्रमुख बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने भी पिछले वित्त वर्ष के दौरान कर्मचारियों की संख्या में लगभग 2.5 फीसदी की कमी की है। बता दें कि वर्ष 1990-2000 के बीच सरकारी बैंकों के कर्मचारियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई थी। तब इन बैंकों के खराब प्रदर्शन के लिए काफी हद कर्मचारियों की लागत को कारण माना गया था। वर्ष 2000-2001 में केंद्र सरकार ने बैंकिंग सेवा भर्ती बोर्ड के जरिए नियुक्ति पर रोक लगा दी थी। उसके तुरंत बाद सरकार ने कर्मचारियों की संख्या कम करने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) लागू की थी। इससे बैंक कर्मचारियों की संख्या में 15 फीसदी की कमी हुई थी। उसके बाद से बैंकों ने छुटपुट स्तर पर ही कर्मचारियों की भर्ती की है। इस दौरान रिजर्व बैंक ने कई बैंकिंग सेवाओं के लिए आउटसोर्सिग करने की अनुमति दे दी है। इसके चलते बैंकों के लिए अब कर्मचारियों को अपने वेतन पर रखने की बाध्यता खत्म हो गई है। सरकारी बैंकों में सिर्फ आईडीबीआई हैं जो लगातार दिल खोल कर नौकरी दे रहा है। लेकिन इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि इसने हाल ही में खुदरा बैंकिंग शुरू की है। साथ ही यह बड़े पैमाने पर विस्तार कर रहा है(जयप्रकाश रंजन,दैनिक जागरण,दिल्ली,28.9.2010)।
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