अमेरिका को आउटसोर्सिग पर पाबंदी लगाने के बजाय रोजगार के अवसर बढ़ाने पर निवेश करना चाहिए। आईटी उद्योग की शीर्ष संस्था नैस्कॉम ने यह बात कही है। नैस्कॉम के अध्यक्ष सोम मित्तल ने कहा कि अमेरिका के इन कदमों से नकारात्मक माहौल बनेगा और दुनिया भर में संरक्षणवाद को बढ़ावा मिलेगा। हाल ही में अमेरिकी प्रांत ओहियो ने सरकारी विभागों द्वारा विदेशी कंपनियों को दिए जाने वाले ठेकों पर पाबंदी लगाने का ऐलान किया है। इससे पहले सीमा सुरक्षा कानून के जरिए अमेरिका भारतीय आईटी पेशेवरों द्वारा मांगे जाने वाले एच-1 बी और एल-1 वीजा पर लिए जाने वाले शुल्क में भी भारी वृद्धि कर चुका है। बंगलोर में नैस्कॉम इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट सर्विसेज समिट 2010 के मौके पर संवाददाताओं से बातचीत में मित्तल ने कहा कि अमेरिकी सीनेट और प्रतिनिधि सभा के लिए हो रहे चुनाव को देखते हुए अमेरिका में इस तरह के और मुद्दे उठ सकते हैं। हमें नहीं पता कि ये कदम किस रूप में सामने आएंगे। जरूरी नहीं है कि सभी कदम भारत को निशाना बनाकर उठाए जाएंगे। यूरोपीय संघ के देशों में एकल वीजा के मुद्दे पर मित्तल ने कहा कि इसके लिए कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि नैस्कॉम ने एक व्हाइट पेपर दिया था जिसे स्वीकार कर लिया गया है। इसमें दिए गए सुझावों से सभी को फायदा होगा। सभी यूरोपीय देशों के लिए एक वीजा होने से लागत घटेगी और काम करना सरल होगा। उधर, देश की तीसरी सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर निर्यातक कंपनी विप्रो का कहना है कि अमेरिका के इस कदम से उस पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि कंपनी ज्यादा से ज्यादा स्थानीय लोगों को भर्ती करने के फार्मूले पर काम करती है। कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी सुरेश सेनापति ने कहा कि हम विदेशों में अपने कारोबारी मॉडल की मजबूती को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। हमारी कोशिश रहती है कि स्टाफ में कम से कम 50 फीसदी स्थानीय लोग हों। कंपनी पिछली तीन तिमाही के दौरान 15 हजार लोगों की भर्ती कर चुकी है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,16.9.2010)।
अच्छा सुझाव है।
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