इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अतिथि प्रवक्ताओं के चयन में जम कर खेल हुआ है। सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) से तो यही साबित कर रही है। स्थिति यह है कि विवि ने अपने यहां अध्ययनरत छात्रा का आवेदन गलत कारणों से निरस्त कर दिया। मामले के प्रकाश में आने के बाद अब अधिकारी दोषियों को दंडित करने की बात कह रहे हैं।। भारती पांडेय ने 1998 में विवि से मानव शास्त्र से स्नातकोत्तर किया। 2001 में एंथ्रोपोलाजी विभाग में प्रो.डीपी दुबे के मार्गदर्शन में शोध छात्रा के रूप में पंजीकरण कराया। शोध का विषय चित्रकूट के धार्मिक तथा सांस्कृतिक परिवेश का अध्ययन था। 2007 में भारती को पीएचडी की उपाधि मिल गई। पिछले दिनों भारती ने विवि के एंथ्रोपोलाजी विभाग में अतिथि प्रवक्ता पद के लिए आवेदन किया, लेकिन उसका चयन नहीं हुआ। इस पर भारती ने सूचना के अधिकार के तहत चयन न होने के कारणों की जानकारी मांगी। 31 अगस्त को मुख्य सूचना अधिकारी आर एल विश्र्वकर्मा द्वारा जारी सूचना में कहा गया कि डॉ.भारती ने समाजशास्त्र विषय में पीएचडी की है। मानव शास्त्र में नहीं। इसके चलते इनका आवेदन निरस्त कर दिया गया। भारती पांडेय के अनुसार विवि उनके मामले में गलत जानकारी दे रहा है। जब शोध प्रबंध जमा किया था, उसके साक्षात्कार के लिए गठित कमेटी में वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो.वी एन सहाय भी शामिल थे। इसके बावजूद गलत जानकारी दी गई। इससे अपने आप गड़बड़ी की पुष्टि हो रही है। डॉ. भारती अब इस मसले पर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही हैं।। वहीं, इलाहाबाद विवि के मुख्य सूचना अधिकारी विश्र्वकर्मा का कहना था कि सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 5(4) व धारा 5(5) के तहत यह प्रावधान है कि अगर सूचना अधिकारी के पास कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है तो वह उसे संबंधित व्यक्ति या विभाग को संदर्भित कर देगा। उक्त विभाग तब मुख्य सूचना अधिकारी के तौर पर काम करेगा और वांछित सूचनाएं देगा। डॉ. भारती पाण्डे को दी गई सूचना भी संबंधित विभाग ने ही दी है। अब अगर विभाग ने इसमें कुछ गड़बड़ी की है तो उन पर दंड भी लग सकता है। अभ्यर्थी इस संबंध में प्रथम अपीलीय अधिकारी होने के नाते विवि के रजिस्ट्रार के पास शिकायत दर्ज करा सकती हैं(अमलेन्दु त्रिपाठी,दैनिक जागरण,इलाहाबाद,23.9.2010)।
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