सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीनियर के अवैध आदेश को न मानना गलत आचरण नहीं है। इस आधार पर किसी कर्मचारी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश पी. सतशिवम और बी.एस. चौहान की पीठ ने यह व्यवस्था एक पुलिस कांस्टेबल द्वारा दायर याचिका पर दी। याचिका में उसने अपनी बर्खास्तगी को निरस्त करने की बात कही थी। न्यायालय ने एक आईपीएस अधिकारी के अवैध आदेश का पालन नहीं करने पर कांस्टेबल मुहम्मद यूनुस खान को बर्खास्त करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की खिंचाई की। पीठ ने कहा, अवैध आदेश का विरोध करना या उसका पालन न करने को हर मामले में कदाचार नहीं कहा जा सकता। यूनुस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी जिसमें उसकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा गया था। कोर्ट ने कहा कि अरविंद कुमार उपाध्याय (आईपीएस) जो गोंडा में पीएसी की 30वीं वाहिनी के सेनानी थे, ने शिकायत की, अपने अधीनस्थ अधिकारी को जांच अधिकारी नियुक्त किया और खुद गवाही देते हुए खान को बर्खास्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे अधिकारियों को मनमाना व्यवहार करने की इजाजत नहीं है। यूनुस खान को आईपीएस अधिकारी द्वारा दी गई सजा को भुगतने से इंकार करने पर बर्खास्त कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता को बर्खास्तगी के दिन से सेवानिवृत्ति के दिन तक का 50 प्रतिशत वेतन दिया जाए। इसके अलावा, सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी लाभ उसे दिए जाएं(दैनिक जागरण,दिल्ली,29.9.2010)।
बिलकुल ठीक निर्णय लिया है सुप्रीम कोर्ट ने
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