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29 सितंबर 2010

ओबामा को झटका, भारत से जारी रहेगी आउटसोर्सिंग

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को करारा झटका लगा है। उनके द्वारा जिस एंटी-आउटसोर्सिंग बिल की वकालत की जा रही है, वह सीनेट में पारित नहीं हो सका। इससे भारत को काफी लाभ हुआ है क्योंकि आउटसोर्सिंग का भारत को काफी फायदा मिलता है।

विपक्षी रिपब्लिकन सांसदों ने सीनेट में इस प्रस्ताव का विरोध किया और यह बिल 53-45 वोट से नामंजूर कर दिया गया। बिल को पारित कराने के लिए कम से कम 60 वोट की जरुरत थी। अमेरिकी राष्ट्रपति इस बिल के समर्थक हैं। उनका मानना है कि इससे अमेरिकी युवाओं के लिए रोजगार के अवसर खुलेंगे। लेकिन सीनेट ने इसे नकार दिया है।

अमेरिकी सीनेट के 37 सीनेटरों के लिए 2 नवंबर को चुनाव होना है। राष्ट्रपति बराक ओबामा चुनाव प्रचार के दौरान इस बिल का काफी समर्थन कर रहे हैं। उनके अनुसार अब अमेरिका से आउटसोर्सिंग पर नियंत्रण लगाया जाना चाहिए जिससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के और अवसर पैदा हों। उन्होंने चेतावनी दी थी कि जो कंपनियां आउटसोर्सिंग करेंगीं उन्हें टैक्स में छूट का लाभ भी नहीं दिया जाएगा। अमेरिका और भारत के सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े कई विशेषज्ञ आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति के रवैये पर विरोध जता चुके हैं।

अमेरिकी कंपनियां बड़े पैमाने पर भारत से आउटसोर्सिंग के जरिए कम खर्च में अपना काम बेहतर तरीके से निकालती हैं। इससे बड़ी संख्‍या में भारतीयों को नौकरी तो मिलती है, लेकिन अमेरिकी कंपनियों का भी बड़ा फायदा होता है। इसलिए अमेरिकी उद्योग जगत भी ओबामा की इस नीति के खिलाफ है।

रिपब्लिकन सीनेटर ओरिन हैच ने डेमोक्रेट्स की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि आउटसोर्सिंग पर उनका रवैया पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना है। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को और नुकसान पहुंचेगा। यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हुई बीमारी का इलाज नहीं है। दूसरे सीनेटर चुक ग्रासले ने भी हैच का समर्थन किया और कहा कि इससे रोजगार के अवसर बढ़ने के बजाए कम होते। इसके अलावा यदि यह बिल पारित हो जाता तो इससे अमेरिकी कंपनियों को काफी नुकसान भी होता।

डेमोक्रेट्स सीनेट में बिल के पारित न होने से निराश हैं। एक डैमोक्रेटिक सांसद हैरी रीड के अनुसार यह तो सामान्य ज्ञान की बात है कि इस बिल से अमेरिकी युवाओं को काफी लाभ होता, लेकिन रिपब्लिकन सीनेटरों की वजह से ऐसा नहीं हो सका।

आउटसोर्सिंग मुद्दे का भारत पर असर

आउटसोर्सिंग पर पाबंदी लगने का भारत पर काफी विपरीत असर पड़ने की आशंका थी। भारत में आईटी व्यवसाय कुल 2244 अरब रुपए का है। सभी नामी कंपनियां, जिनमें इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल और टीसीएस है को बड़े पैमाने पर अमेरिका से आउटसोर्सिंग के जरिए काम मिलता है। और इसी व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए इन कंपनियों ने अमेरिका में भी अपने दफ्तर खोले हैं। हाल ही में अमेरिका के ओहियो राज्य ने आउटसोर्सिंग पर पाबंदी लगा दी जिस बारे में भारतीय आईटी सेक्टर ने चिता जताई थी। एसएमसी कैपिटल इक्विटी के प्रमुख जगन्नाथ थुनगुंटला ने कहा कि इस फैसले से भारतीय कंपनियों पर आर्थिक के अलावा मनोवैज्ञानिक असर भी पड़ा है। भारत दूसरे मुद्दों के अलावा नवंबर में भारत आ रहे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सामने यह मुद्दा भी उठाने की तैयारी कर रही है(भास्कर डॉट कॉम,29.9.2010)।
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एंटी आउट सोर्सिंग बिल पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को करारा झटका लगा है। ओबामा द्वारा पिछले काफी दिनों से जिस एंटी-आउटसोर्सिंग बिल की वकालत की जा रही थी, वह अमेरिकी संसद के उच्च सदन सीनेट में पारित नहीं हो सका। इससे भारत को फायदा हुआ है क्योंकि आउटसोर्सिंग से भारत को काफी फायदा मिलता था। विपक्षी रिपब्लिकन सांसदों ने सीनेट में इस प्रस्ताव का विरोध किया और यह बिल 53-45 वोट से नामंजूर कर दिया गया। बिल को पारित कराने के लिए कम से कम 60 वोट की जरुरत थी। अमेरिकी राष्ट्रपति आउटसोर्सिंग की सख्त मुखालफत कर रहे हैं। ओबामा का मानना है आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने से अमेरिकी युवाओं के लिए रोजगार के अवसर खुलेंगे। जिससे अमेरिका की बेरोजगारी दर में कमी आएगी। लेकिन सीनेट ने इसे नकार दिया है(अमर उजाला डॉट कॉम,29.9.2010)।

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