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06 सितंबर 2010

उत्तराखंड में विभागों का नामकरण संस्कृत में

उत्तराखंड में द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिए जाने के बाद अब संस्कृत भाषा को घर घर पहुचाने की योजना शुरू की गई है। राज्य सरकार ने सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर अधिकारियों के नाम, पदनाम, स्लोगन व अन्य ब्योरा संस्कृत में लिखने का निर्देश जारी किया है। देश में उत्तराखंड एकमात्र राज्य है जहां संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है। मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा जिलाधिकारियों को जारी निर्देश में कहा गया है कि सभी कार्यालयों, अनुभाग का नाम, अफसरों के नाम, पदनाम एवं अहम सूचनाएं व स्लोगन आदि से संबंधित सभी सूचना पट हिंदी एवं संस्कृत दोनों भाषाओं में लगाए जाएं। ग्राम विकास से संबंधित एवं अन्य कल्याणकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार भी दोनों भाषाओं में किया जाए। अगर किसी को समस्या होती है तो संबंधित अधिकारी संस्कृत भाषा के अनुवाद के लिए उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव एवं कुलसचिव संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार से सहायता ले सकता है। नई व्यवस्था के तहत मीडिया सेंटर को प्रचार प्रसार तंत्र केंद्रम और लालटेन को कांच मंजूषा के नाम से जाना जाएगा। सस्ते गल्ले की दुकानों पर अब न्यून मूल्यान्न भंडारम को बोर्ड दिखाई देगा और इसी तरह जिला आपूर्ति अधिकारी के बोर्ड पर जनपदा पू‌र्त्यधिकारी कार्यालयम लिखा दिखाई देगा। अंतरराज्यीय बस अड्डे पर अन्तराज्यीय बस स्थानम के नाम से जाना जाएगा। कुर्सी को आसंदि, मेज को उत्पीठम, ग्लास को चसक का नाम दिया जाएगा। डीएम ने विभागाध्यक्षों को तीन दिन के भीतर सरकारी कार्यालयों का नाम संस्कृत में लिखकर फोटो उपलब्ध कराने के आदेश दिए हैं। मुख्यमंत्री निशंक का कहना है कि संस्कृत तो राज्य के कण कण में बसी है। वेद, पुराण व अन्य ग्रंथों की रचना यहींहुई। बद्रीनाथ धाम के पास वेद व्यास की गुफा आज भी है। इसी में बैठकर महर्षि व्यास ने वेद की रचना की और महाभारत को लिखा था। यहीं पर गणेश की भी गुफा है जिन्होंने महाभारत को लिपिबद्ध किया था। उन्होंने कहा, संस्कृत के महाकवि कालीदास की जन्म और कर्मस्थली भी उत्तराखंड में ही है(महेशपांडे,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,6.9.2010)।

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