सरकार ने मेडिकल कॉलेजों में एबीबीएस की सींटें बढ़ाने की कवायद तो शुरू कर दी, लेकिन पढ़ाई की व्यवस्था की दिशा में सरकार की कोशिश विफल नजर आ रही है।
चिकित्सा विभाग ने हाल ही चिकित्सक शिक्षकों की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला था, लेकिन विभाग को नाममात्र के आवेदन ही मिले हैं। एनोटॉमी, फिजियोलॉजी, फार्माकोलॉजी, फोरेंसिक मेडिसिन, एनस्थिसिया, रेडियोलॉजी, एंडोक्राइनोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, यूरोलॉजी, पीडियाट्रिक सर्जरी आदि विषयों के लिए किसी भी चिकित्सक ने आवेदन नहीं किया।
सहायक आचार्य पद के लिए करीब 20 हजार और वरिष्ठ प्रदर्शक के लिए 16 हजार रु. मासिक वेतन का प्रावधान है, जो देश के अन्य मेडिकल कॉलेजों से काफी कम है। सरकार ने अगस्त में एसएमएस मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की 100 और प्रदेश के पांच अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 50-50 सीटें बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार और एमसीआई को प्रस्ताव भेजा है। एमसीआई की ओर से दिसंबर में सभी मेडिकल कॉलेजों का निरीक्षण भी प्रस्तावित है।
इसलिए दिलचस्पी नहीं : मेडिकल कॉलेज में नियुक्ति पाने में डॉक्टरों की रुचि नहीं होने का प्रमुख कारण कम वेतन है। दूसरी ओर जहां अन्य राज्यों में छह से 13 साल में प्रोफेसर व सीनियर प्रोफेसर की पदोन्नति हो जाती है, वहीं राज्य में ज्यादातर डॉक्टरों को समयबद्ध पदोन्नति नहीं मिल पा रही है।
नियमों में शिथिलता: एमसीआई ने जिला अस्पतालों में मेडिकल कॉलेज खोलने की सिफारिश की है। इसके लिए नियमों शिथिलता भी दी है। अब 20 की बजाय 10 एकड़ में ही कॉलेज खोले जा सकते हैं। जमीन दो टुकड़ों में हो तो कॉलेज व अस्पताल अलग भी खोले जा सकते हैं, लेकिन पांच किमी के दायरे में।
यह हैं नियम
एमसीआई के नियमानुसार ढाई सौ सीटें होने की स्थिति में मेडिकल कॉलेजों में ये सुविधाएं अनिवार्य हैं: चिकित्सकों के 95 फीसदी पद भरे हों। सेंट्रल लाइब्रेरी में इनसाइड व आउटसाइड में 250-250 विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था के साथ स्टाफ रीडिंग रूम। हर कॉलेज में सात लेक्चर थिएटर, जिनमें से छह में 300 और एक में 650 विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था व ओवरहेड, स्लाइड, एलसीडी प्रोजेक्टर और माइक्रोफोन की सुविधाएं। फार्माकोलॉजी विभाग में एनिमल हाउस, फार्माकोविजिलेंस सेंटर व कंप्यूटर आधारित प्रयोगशाला। प्रत्येक विभाग में म्यूजियम, रिसर्च लैब, इंटरनेट।
करोड़ों की मशीन बेकार: कार्डियक थोरेसिक सर्जरी विभाग में विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं होने से उदयपुर और जोधपुर में करोड़ों रुपए की हार्ट लंग्स मशीन बेकार पड़ी हैं। जयपुर में भी 60 लाख रुपए की लागत की मशीन किसी काम नहीं आ रही है।
प्राचार्यो को एमसीआई के निरीक्षण से पहले सभी मानदंड़ पूरे करने के निर्देश दिए हैं। मानते हैं कि कुछ विषयों में फैकल्टी की कमी है, जिसे दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। - एमादुद्दीन अहमद खान, चिकित्सा मंत्री
फैकल्टी की पहले से ही कमी है। वेतन कम होने और समयबद्ध पदोन्नति नहीं मिलने के कारण डॉक्टर दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। - डॉ.आर.सी.यादव, सचिव, राजस्थान मेडिकल कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन
(सुरेन्द्र स्वामी,दैनिक भास्कर,जयपुर,9.10.2010)
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