केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय कर्मचारियों को 10 प्रतिशत की दर से महंगाई भत्ता दिए जाने का निर्णय लेने से इन कर्मियों को मूल वेतन का 45 प्रतिशत महंगाई भत्ते के रूप में मिलने लगेगा। छठे वेतन आयोग के आधार पर जनवरी 2010 से जून 2010 के बीच कीमत वृद्धि की भरपाई के लिए ऐसा किया गया है। इस फैसले से 50 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और 38 लाख पेंशनरों को लाभ मिलेगा। इसके साथ ही साथ राज्यों में भी देर-सबेर यह बढ़ा हुआ महंगाई भत्ता लागू हो जाएगा।
जिस प्रकार से केंद्रीय कर्मचारियों को महंगाई की भरपाई के लिए महंगाई भत्ता दिया जाता है, निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता। कहने को तो निजी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाओं के तहत कर्मचारी काम करते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि यहां कुछ कर्मचारी स्थाई होते हैं और कुछ अस्थाई यानी ठेके के आधार पर काम करते हैं। स्थाई कर्मचारियों के वेतन में प्रतिवर्ष बढ़ोतरी का निश्चित प्रावधान होता है।
वहीं ठेके पर लगे कर्मचारियों को संस्थान की आवश्यकता और प्रबंधन की मर्जी के हिसाब से कभी भी हटाया जा सकता है। इसके साथ ही साथ कर्मचारियों की एक ठेकेदारी व्यवस्था भी चल रही है। पिछले लगभग 2 दशकों से सामान्यत: चौकीदार, सफाई कर्मचारी, ड्राइवर और अन्य कर्मचारियों को ठेकेदारों के माध्यम से रखने की पद्धति शुरू की गई है। इन कर्मचारियों को वेतन वितरण संबंधित नियोक्ता ठेकेदार द्वारा किया जाता है और ठेकेदार का सौदा संस्थान के साथ होता है। इस तरह सौदे से मिली कुल राशि और कर्मचारियों के वेतन के बीच का अंतर ठेकेदार को लाभ के रूप में मिलता है, लेकिन इन सभी प्रकार की पद्धतियों के अंतर्गत काम करने वाले कर्मचारियों में एक बात समान होती है कि महंगाई की भरपाई के लिए वेतन वृद्धि का कोई प्रावधान नहीं होता यानी निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को उनकी मांग व पूर्ति के आधार पर, कार्यकुशलता, कार्य निष्पादन अथवा लक्ष्य प्राप्ति आदि के आधार पर वेतन वृद्धि तो हो सकती है, लेकिन महंगाई की भरपाई का कोई साधन वहां नहीं है। महंगाई केवल सरकारी कर्मचारियों को ही नहीं, बल्कि सभी वर्गो को प्रभावित करती है।
सामान्यत: यह माना जाता है कि व्यापार-व्यवसाय में लगे लोगों को महंगाई होने पर उसका लाभ स्वत: हो जाता है, हालांकि ऐसा हो ही, यह जरूरी नहीं। किसानों पर महंगाई की मार सबसे ज्यादा होती है। उसी प्रकार निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को एक निश्चित आय मिलने के कारण उनकी क्रय शक्ति क्षीण हो जाती है। सॉॅफ्टवेयर और सूचना प्रौद्योगिकी में काम करने वाले लोगों को अपवाद के रूप में छोड़ दें तो बहुसंख्यक कर्मचारियों का वास्तविक वेतन तथा मजदूरी लगातार घट रही है। ठेकेदारों द्वारा लगाए गए मजदूरों और अन्य कर्मचारियों की हालत लगातार दयनीय बनी हुई है। मात्र 3000 से 5000 रुपये प्रतिमाह वेतन पर काम करने वाले ये लोग किस प्रकार से जीवन-यापन करते होंगे, यह कल्पना से बाहर है। हालांकि समय-समय पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बढ़ती महंगाई के आधार पर न्यूनतम वेतन में वृद्धि की जाती है, लेकिन यह कटु सत्य है कि ठेकेदारी पद्धति में काम करने वाले इन मजदूरों को न्यूनतम वेतन भी प्राप्त नहीं होता है।
यदि समता के आधार पर बात की जाए तो न्यूनतम वेतन से अधिक पाने वाले निजी क्षेत्र के कार्मिकों को भी मंहगाई भत्ते के रूप में महंगाई की भरपाई की जानी चाहिए। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता है, लेकिन यह कार्य असंभव नहीं है। यदि सभी निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तर्ज पर हर 6 महीने में उपभोक्ता सूचकांक के आधार पर महंगाई भत्ता दिया जाना अनिवार्य कर दिया जाए तो ऐसा संभव है। इसमें खतरा यह है कि स्थाई कर्मचारियों को छोड़कर अस्थाई कर्मचारियों का रोजगार खतरे में पड़ सकता है। इसके लिए तर्क यह है कि देश में श्रम कानून इतने कड़े हैं कि यदि कर्मचारियों को स्थाई रूप से रखा जाता है तो आवश्यकता न होने पर भी उनको निकालना आसान नहीं होता। इसलिए हायर एंड फायर की अनुमति निजी क्षेत्र से उठती रहती है। श्रम संगठनों के दबाव में श्रम कानूनों में बदलाव नहीं हो पाता है। इस कारण नए कर्मचारियों के लिए उचित शर्तों पर रोजगार संभव नहीं हो पाता। इस संबंध में सरकार, श्रम संगठनों और रोजगार देने वाली कंपनियों के संगठनों (चैंबरों) के साथ त्रिपक्षीय बातचीत प्रभावी हल निकालने में सहायक हो सकती है(अश्विनी महाजन,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,30.9.2010)।
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