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01 अक्टूबर 2010

ओबामा प्रशासन को झटका

इसे एक संयोग के अलावा और क्या कहा जा सकता है कि भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा जिस समय अमेरिका में विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से मुलाकात के दौरान भारतीय हितों से जुड़े मुद्दे उठा रहे थे, उसी दिन अमेरिकी कांग्रेस के ऊपरी सदन सीनेट में ओबामा प्रशासन का आउटसोर्सिंग विरोधी बिल गिर गया? इस घटनाक्रम से उसे आघात लगेगा। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आगामी नवंबर में होने वाले संसद के चुनाव जीतने की गरज से देश में आउटसोर्सिंग विरोधी माहौल बनाने की कोशिश की है, जिसका असर भारत की आईटी कंपनियों पर पड़ने लगा है। राष्ट्रपति ओबामा को चीन-भारत ग्रंथि खाए जा रही है और इधर उनका प्रायः हर भाषण इस टेक से शुरू होता है कि अमेरीकियों ! संभल जाओ नहीं तो चीनी और भारतीय तुमसे आगे निकल जाएँगे। वैसे भी रिपब्लिकन पार्टी की तुलना में डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रशासन भारत के ज्यादा खिलाफ साबित होता रहा है। मगर ओबामा प्रशासन की संवदेनहीनता तो कुछ ज्यादा ही है। एक क्षण वे भारत की तारीफ करते हैं तो दूसरे ही क्षण एच-१ बी वीसा की फीस बढ़ाने और आउटसोर्सिंग पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति दे देते हैं। रिपब्लिकन पार्टी का मत है कि आउटसोर्सिंग का मसला सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा भर है। इससे अमेरीकियों को रोजगार तो क्या मिलेगा, उलटे जो अमेरिकी कंपनियाँ आउटसोर्सिंग के कारण आज लाभ की स्थिति में हैं, वे भी बैठने लगेंगी। अमेरिका पर अभी भी २००८ की मंदी का असर साफ देखा जा सकता है। वह मुक्त व्यापार का पुरोधा होने का दावा करता है मगर खुद ही संरक्षणवादी नीतियाँ अपना रहा है। इसी तरह से एच-१ बी वीसा की फीस बढ़ने से भी भारतीय साफ्टवेयर और आईटी कंपनियाँ प्रभावित हो रही हैं। इसलिए एसएम कृष्णा ने उचित ही ये मुद्दे उठाए हैं। बढ़ते संबंधों के दायरे में ये मुद्दे भले ही हमारे लिए बहुत बड़े न हों लेकिन इनका प्रतीकात्मक महत्व है क्योंकि इनसे आम हिन्दुस्तानी यात्री पर असर पड़ता है। राष्ट्रपति ओबामा आगामी नवंबर में भारत आ रहे हैं और चाहते हैं कि उनकी यात्रा से पहले-पहले परमाणु दायित्व विधेयक को लेकर कंपनियों के मन में जो संदेह पैदा हो गए हैं, उनका निराकरण हो जाए। इस विधेयक को भारत न तो और नरम बनाने की स्थिति में है और न ही उसे ऐसा कोई संकेत देना चाहिए। अलबत्ता अमेरीकियों के भ्रम दूर करने के लिए उसे हमेशा तैयार रहना चाहिए। पिछले दिनों ऐसी खबरें भी सामने आई थीं कि अमेरिका भारत को अरबों रुपए के हथियार बेचने की कोशिश में है। भारत को जब तक अमेरिका इन हथियारों के निर्माण की टेक्नोलॉजी न दे, तब तक हमें उससे हथियार खरीदने के बारे में दस बार सोचना चाहिए। भारत आज पी एल-४८० वाले दौर का देश नहीं है, जब उसे अमेरिका अपना लाल गेहूँ देता था। वह आज एक आर्थिक शक्ति है जिसकी अमेरिका को भी उतनी ही जरूरत है, जितनी भारत को उसकी है। ओबामा की भारत यात्रा की तैयारियों के कोलाहल में इस सचाई को ध्यान में रखा जाना चाहिए। अगर ओबामा प्रशासन सचमुच यह कह रहा है कि भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनना है तो उसे पहले कश्मीर मसले का हल ढूँढना होगा, तो इसे क्या समझा जाए? क्या पाकिस्तान के पक्ष में दबाव डालने की कोशिश? इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता(संपादकीय,नई दुनिया,इन्दौर,30.09.2010)।

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