सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि सशस्त्र सेना की विधिक और शिक्षा के अलावा सेना की दूसरी नॉन कॉम्बैट इकाइयों में भी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की सम्भावनाएं तलाशी जाएं।
न्यायमूर्ति जेएम पांचाल और ज्ञान सुधा मिश्रा की खंडपीठ ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट के १२ मार्च के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई २२ नवंबर के लिए स्थगित करते हुए केन्द्र सरकार को यह सुझाव दिया। इस बीच, सरकार ने कोर्ट में दिए आश्वासन के अनुरूप महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के सवाल पर विचार की प्रक्रिया पूरी करने के लिए एक दिसंबर तक का समय देने का अनुरोध किया है।
इस बीच, सैन्य अधिकारी बबिता पुनिया और दूसरी महिला अधिकारियों की वकील मीनाक्षी लेखी और रेखा पल्ली ने आरोप लगाया कि केन्द्र सरकार इस मामले में जानबूझ कर ढुलमुल रवैया अपना रही है। उनका कहना था कि सरकार को काम्बैट इकाइयों के अलावा सैन्य सेवा कोर, आर्मी आर्डनांस कोर, सैन्य अभियांत्रिक सेवा, मिलिट्री इंटेलिजेंन्स और सिग्नल जैसी सेना की सभी दूसरी इकाइयों में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने पर विचार करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने गत २६ जुलाई को सरकार से उस अधिसूचना को पेश करने का आदेश दिया था जिसके तहत सशस्त्र सेना में महिला अधिकारियों के स्थायी कमीशन को प्रतिबंधित किया गया है।
हाईकोर्ट ने ६० से अधिक महिला सैन्य अधिकारियों की याचिका पर सरकार को सशस्त्र सेनाओं में शार्ट सर्विस कमीशन में सेवारत महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन प्रदान करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि सेना में महिला अधिकारियों के साथ पुरुष अधिकारियों के समान ही व्यवहार होना चाहिए। लेकिन सरकार इसके पक्ष में नहीं है। महिला सैन्य अधिकारी चाहती हैं कि उनके साथ पुरुष सैन्य अधिकारियों जैसा ही व्यवहार हो(नई दुनिया,दिल्ली,5.10.2010)।
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