चेकों के जरिए ठगी के अब तक हजारों केस सामने आ चुके हैं, पर देश में अपनी तरह के संभवत: पहले मामले में ठगों ने ठगी के लिए दर्जनों बैंकों के ओरिजिनल चेक पेपर ही चुरा लिए। बाद में इन आरोपियों ने कोर बैंकिंग सिस्टम की धज्जियां उड़ाते हुए तमाम लोगों को लाखों रुपए की चपत लगा दी।
क्राइम ब्रांच के अडिशनल सीपी देवेन भारती ने एनबीटी को बताया कि इस मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनके नाम हैं अरुण कुमार भट्ट, विश्वनाथ शुक्ला, कमलेश दोनाडे, संतोष शिंदे और हरीश चौरे।
जिस तरह इंडियन करेंसी एक खास सिक्युरिटी प्रेस में एक खास पेपर पर छपती है, उसी तरह बैंक के चेक भी कुछ खास प्रेस में एक विशेष तरह के कागज पर तैयार किए जाते हैं। इन कागजों पर अलग-अलग बैंकों का बाकायदा वाटर मार्क भी होता है। इस गैंग का एक आदमी, जो फिलहाल फरार है, प्रिंटिंग प्रेस से बैंकों के इन्हीं पेपर को चुरा लेता था और बाद में चेक साइज में पेपर की कटिंग कर देता था। इसके बाद गैंग का दूसरा सदस्य किसी कूरियरवाले को पटाकर उन चेकों को लिफाफे से बाहर निकाल लेता था, जिन्हें किसी कंपनी या व्यक्ति के पते पर भेजा जाना होता था। यह व्यक्ति इन चेकों की कलर जेरॉक्स निकालकर वापस चेकों को लिफाफे में रखने के लिए कूरियरवाले को दे देता था। इसके बाद गैंग का संतोष शिंदे नामक सिग्नेचर स्पेशलिस्ट कलर जेरॉक्स कराए गए चेकों पर किए हुए दस्तखत को गौर से देखता था और फिर इसी तरह के दस्तखत बनाने की लगातार प्रैक्टिस करता रहता था। बाद में प्रिंटिंग प्रेस से चुराए गए चेक पेपर पर संतोष शिंदे चुराए गए चेक में लिखे सिग्नेचर जैसे ही दस्तखत कर देता था।
पर इस सिग्नेचर करने से पहले हरीश चौरे नामक आरोपी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती थी। वह चेक पेपर पर कोरल ड्रा साफ्टवेअर को यूज करके चेक पर वो लाइनें बनाता था, जिस पर किसी का नाम और राशि बाद में लिखी जाती थी। किसी चेक के पूरे फॉर्मेट के लिए बैंकों द्वारा दरअसल यही साफ्टवेअर यूज किया जाता है। हरीश कलर जेरॉक्स कराए गए चेक में लिखे गए अकाउंट नंबर, इसी चेक में सबसे नीचे लिए हुए 6 अंकों के चेक नंबर और 9 अंकों के एमआईसीआर कोड नंबर वगैरह को स्कैन के जरिए प्रिंटिंग प्रेस से चुराए गए चेक पेपर पर फीड कर देता था।
चूंकि कलर जेरॉक्स कराने के बाद मूल चेक को कूरियर लिफाफे में वापस रखकर संबंधित कंपनी या व्यक्ति को पहले ही भेजा जा चुका होता था, इसलिए इस मूल चेक के नीचे लिए 6 अंकों वाले चेक नंबर को यदि प्रिंटिंग प्रेस से चुराए गए चेक पेपर पर बिल्कुल वैसा ही फीड कर दिया जाता, तो फौरन पोल खुलने का खतरा रहता। इसलिए हरीश चौरे नामक आरोपी इन 6 अंकों में से कोई एक नंबर फिर स्कैनिंग के जरिए इधर-उधर कर देता था। इसके बाद कमलेश दोनाडे नामक एक और आरोपी चेक पर हाथ से किसी का नाम और राशि लिख देता और फिर इसी नाम का अकाउंट उसी बैंक की किसी शाखा में खोल दिया जाता, जिस बैंक के चेक पर सारा गोरखधंधा किया गया होता था। बैंक में अकाउंट खोलने का काम अरुण कुमार भट्ट नामक आरोपी को दिया गया होता था।
जब सीनियर इंस्पेक्टर शशांक सांडभोर, विल्सन राड्रिग्स, अजय सावंत, दिलीप देशमुख, करण सोनकवडे और राजेश साल्वी ने इस मामले की छानबीन की, तो उन्होंने पाया कि इस गैंग के सदस्य बैंकों के बंद होने के समय से ठीक पांच-दस मिनट पहले किसी बैंक की शाखा में पहुंच जाते थे और बहुत अर्जेंट का बहाना कर बैंक कर्मचारी से इस चेक का फौरन अकाउंट में जमा करने को अनुरोध करते थे। उस वक्त बैंक कर्मचारी घर जाने की हड़बड़ी में चेक में नीचे लिखे 6 अंकों के चेक नंबरों की पड़ताल ही नहीं कर पाता था और चूंकि चेक कोर बैंकिंक सिस्टम का हिस्सा होता था, इसलिए यह चेक फौरन अकाउंट में ट्रांसफर हो जाता था।
यहां बताना जरूरी है कि कोर बैंकिंग सिस्टम में किसी बैंक का चेक यदि उसी बैंक के किसी अकाउंट धारक के नाम होता है, तो चेक मिनटों में अकाउंट में ट्रांसफर हो जाता है। एक बार चेक अकाउंट में ट्रांसफर होते ही गैंग के सदस्य अलग-अलग एटीएम बूथ में जाते थे और कुछ ही मिनटों में पूरी रकम विदड्रॉ कर देते थे(सुनील मेहरोत्रा,नवभारत टाइम्स,मुंबई,10.10.10)।
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