नवाचारों के प्रति उदासीनता और कमजोर मनोबल ऐतिहासिक सौगातें भी किस तरह मिट्टी में मिल जाती हैं। इसका उदाहरण है बरकतउल्ला विश्वविद्यालय को मिले नए विभाग और आधा सैकड़ा पद। प्रशासन में इच्छा शक्ति की कमी के कारण ये दोनों ही सौगात लेप्स होने की कगार पर पहुंच गए हैं। जानकारी के अनुसार 11 वीं पंचवर्षीय योजना के तहत यूजीसी ने बीयू को चार नए विभाग एवं 49 शैक्षणिक पदों की स्वीकृति दी है।
इतिहास गवाह है कि विवि को 37 वर्ष में इतने अधिक पद आजतक नहीं मिले। पहली बार व्याख्याता के 43 और प्रवाचक रीडर के छह पद दिए गए हैं। इनके लिए पांच साल तक अनुदान भी यूजीसी द्वारा ही दिया जाना था। इन पदों की मंजूरी के साथ ही न केवल विवि में संविदा पर सालों से कार्यरत शिक्षकों की उम्मीद बंध गई। वहीं वर्षो से पदों का रोना रोने वाले विवि के लिए भी शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने का एक बढि़या मौका माना जा रहा था। इनके अलावा चार विभाग पर यूजीसी द्वारा इसी योजना में मंजूर किए गए थे। इनमें इतिहास अंग्रेजी, रसायन शास्त्र एवं राजनीति शास्त्र विभाग शामिल हैं। इन विषयों के लिए विशेष विभाग की जरूरत भी लंबे समय से महसूस की जा रही थी। इसके लिए एकमुश्त राशि भी यूजीसी ने स्वीकृत की है।
मगर इन सौगात का अब मिट्टी में मिलता तय माना जा रहा है। इसकी वजह है विवि प्रशासन की इच्छा शक्ति में कमी। नियमानुसार इनके लिए अब तक काम शुरू हो जाना था। मगर पहले तो पूर्व कुलपति प्रो. रविंद्र जैन की अक्षमता इन सौगातों पर हावी रही। यूजीसी से मिले पदों को भरने का साहस वे नहीं दिखा सके। एक साल तक वे इन्हें दबाकर बैठे रहे। उनकी रवानगी के बाद तीन महीने कार्यवाहक कुलपति रहे। मगर विश्वविद्यालय को स्थायित्व मिलने के छह माह बाद भी यह सौगात प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं आ जुड़ सकी है। इस पर पहल करना तो दूर कोई हाथ डालने ही तैयार नहीं है। यदि मार्च 2011 तक प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई तो पद और विभाग दोनों ही लेप्स हो जाएंगे।
इसलिए कतरा रहा है विवि :
विवि के लिए शिक्षकों की भर्ती हमेशा से ही विवाद का विषय रही है। पूर्व में चार साल पहले तत्कालीन कुलपति प्रो.आरएस सिरोही ने पदों पर भर्ती की कोशिश की थी। पूरी ताकत लगाने के बाद भी वे इस काम में सफल भी हो गए थे, लेकिन प्रक्रियात्मक कमियों की बलि वे चढ़ गए। भर्ती में अनियमितता के कारण उन्हें कुर्सी छोड़ना पड़ी थी। यही भय अब भी अपना असर दिखा रहा है। इसके अलावा नियमित भर्ती की जगह संविदा पर अपने लोगों को उपकृत करना आसान होता है। इसके चलते सालों साल संविदा और अतिथि के जरिए ही पढ़ाई कराई जाती है। युवा बेरोजगारों पर कुठाराघात : एक ओर बड़ी संख्या में बेरोजगार इन पदों को लेकर उम्मीद लगाए बैठे हैं। सालों से संविदा आधार पर पढ़ा रहे शिक्षक दावेदारी की तैयारी करके बैठे हैं। ऐसे में विवि का रवैया न केवल युवाओं को उदास कर रहा है, बल्कि विवि के शिक्षक भी इसे लेकर खासे नाराज हैं(दैनिक जागरण,भोपाल,10.10.2010)।
शिक्षा के क्षेत्र में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय की छवि अच्छी नहीं है |
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