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09 अक्टूबर 2010

मध्यप्रदेशःप्रोफेशनल कोर्स में शासन की एनओसी बेमानी

बीएड, बीपीएड, नर्सिग अथवा विधि संबंधी कोर्स शुरू करने के लिए कालेज संचालकों को राज्य शासन के दफ्तरों व विश्वविद्यालय के चक्कर काटने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रीय स्तर की रेग्यूलेटरी बॉडी की अनुमति के बाद तो राज्य शासन के विभाग आनाकानी कर सकते हैं और न प्रदेश के विश्वविद्यालयों को ही इंकार करने का अधिकार है। नेशनल बॉडी की अनुमति ही कोर्स संचालित करने के लिए काफी है। शासन की एनओसी को लेकर लंबे समय से रहे विवाद का प्रदेश के कुलाधिपति ने पटाक्षेप कर दिया है। इतना ही नहीं उच्च शिक्षा विभाग द्वारा एनओसी के लिए कालेजों पर दबाव बनाने की शिकायत पर नाराजगी भी जताई है। समन्वय समिति की 82 वीं बैठक में कुलाधिपति से साफ कर दिया कि नेशनल बॉडी की अनुमति के बाद राज्य शासन के विभागों और विश्वविद्यालयों की एनओसी का कोई औचित्य नहीं बचता। एनसीटीई, एआईसीटीई, बार कौंसिल, फार्मेसी, नर्सिग या डेंटल कौंसिल की अनुमति के बाद राज्य शासन के विभाग मान्यता देने से मना नहीं कर सकते। उन्हें मान्यता देना ही होगा। वहीं शासन की एनओसी की कमी निकालते हुए विश्वविद्यालय भी संबद्धता देने से इंकार नहीं कर सकते। समन्वय समिति की बैठक में हुए फैसला के आधार पर राजभवन सचिवालय ने इसके आदेश भी जारी कर दिए हैं। 

विवि को करना होगा अमल :
 राजभवन सचिवालय ने प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों को इस संबंध में समन्वय के फैसले की प्रति भेज दी है। समन्वय समिति ने उच्चतम न्यायालय द्वारा मार्च 2006 में दिए गए आदेश को आधार बनाया है। संत ज्ञानेश्वर शिक्षण संस्थान द्वारा महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ दायर इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने भी राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं की अनुमति के बाद राज्य शासन की एनओसी को औचित्यहीन ठहराया है। समन्वय समिति ने अपने आदेश में इसके तत्काल क्रियान्वयन के निर्देश दिए हैं(दैनिक जागरण,भोपाल,9.10.2010)।

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