सबको शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) को लेकर भले ही राजधानी के तमाम निजी स्कूलों का रुख साफ न हो, पर विश्व विख्यात द दून स्कूल ने साफ कर दिया है कि यह एक सराहनीय पहल है और स्कूल इसके समर्थन में है। स्कूल के हेड मास्टर डॉ. पीटर मैक्लाहलीन ने कहा कि दून स्कूल हमेशा हर तबके और हर हिस्से के छात्रों को शिक्षा प्रदान करता रहा है। इतिहास पर गौर करें तो दून स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने वाले 70 फीसदी छात्र मध्यम वर्ग से रहे हैं। शुक्रवार को द दून स्कूल के प्लेटिनम जुबली समारोह की अधिकारिक घोषणा करते हुए डॉ. मैक्लाहलीन ने कहा कि शिक्षा पर सबका समान अधिकार है। केंद्र सरकार के शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को प्रवेश के लिए स्कूल तैयार है। जो भी मानक सरकार की ओर से तय किए जाएंगे, उन्हें पूरा करने का प्रयास होगा। उन्होंने कहा कि यह मानना गलत है कि द दून स्कूल केवल आर्थिक रूप से मजबूत छात्रों को लिए है। बाहरी रूप से देखने पर ऐसा लग सकता है, पर इतिहास व आंकड़ों पर गौर करें तो द दून स्कूल में अब तक शिक्षा प्राप्त करने वाले 70 फीसदी छात्र सामान्य परिवार व छोटे शहरों या कस्बों के रहने वाले रहे हैं। उन्होंने कहा कि अच्छी शिक्षा पर सबका हक है, ऐसे में द दून स्कूल आरटीई के तहत जो भी नियम तय होंगे उन्हें पूरा करने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इंडियन पब्लिक स्कूल सोसाइटी (द दून स्कूल की संस्थापक) ने कभी इसे अंतर्राष्ट्रीय स्कूल बनाने की कोशिश नहीं की। यह पूरी तरह भारतीय छात्रों का स्कूल है। यहां दुनियाभर में रहने वाले भारतीय छात्र शिक्षा ग्रहण करते हैं। उन्होंने कहा कि यूरोप, कनाडा, सिंगापुर समेत एक दर्जन से ज्यादा देशों में रहने वाले भारतीय छात्र द दून स्कूल के छात्र रहे हैं। डॉ. लाहलीन ने कहा कि 1935 से लेकर अब तक द दून स्कूल की आत्मा में कोई बदलाव नहीं आया है। बदलाव आया तो केवल ढांचागत संसाधनों में। आधुनिक दौर में आधुनिक क्लास रूम आए, कंप्यूटर आए, पर स्कूल का उद्देश्य और आत्मा आज भी वही है। भारत सरकार के समाज हित से जुड़े सभी प्रयासों में द दून साथ है(दैनिक जागरण,देहरादून,9.10.2010)।
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