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11 अक्टूबर 2010

दिल्ली में शिक्षकों की हाजिरी

कभी-कभी अखबारों में यूनिवर्सिटी के शिक्षकों की अच्छी खबर छप जाती है। इस बार भी यह छपा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापकों को आते और जाते समय रजिस्टर में हस्ताक्षर करने होंगे। वैसे ये मेरे लिए अजीब बात थी। विश्वविद्यालय के आला अफसरों को अध्यापकों की नैतिकता पर अविश्वास कैसे हुआ। उन्हें हाजिरी का सबूत चाहिए। भले ही उनके पास रजिस्टर खोलने का वक्त न हो। ये आजकल की बात है, वेतन आयोग ने वेतन बढ़ाने की सिफारिश कर दी तो उसी हिसाब से काम भी बढ़ा दिया गया। अध्यापकों को यह अच्छी तरह से मालूम है कि यह घोषणा शलगम पर मिट्टी उतारने जैसी है। रजिस्टर खरीदने के लिए एक कमेटी बना दी जाएगी और वो काम कभी पूरा नहीं होगा। जिस काम को न करना हो उसके लिए कमेटी बना दी जाती है। सालों गुजर जाते है फिर भी काम नहीं होता है। मैंने समाचार पढ़ते ही अपने दो-तीन सहयोगियों से इस बाबत पूछा तो उन्होंने लापरवाही से उत्तर दिया हमें क्या, हम तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ये नजरिया ऐसा ही है जैसे कि कह रहे हों कि किसी ने शनिवार, रविवार के साथ बिना सूचित किए शुक्रवार की छुट्टी कर ली हो। नजरिया बदलते देर नहीं लगती। एक जमाना था जब प्रिंसिपल को अपने टीचिंग स्टाफ पर इस कदर भरोसा रहता था कि वे सोचते थे कि रजिस्टर रखने की कोई जरूरत ही नहीं है। उसकी उपस्थिति हो या न हो, लेकिन टीचर समय से आकर क्लास को नियमपूर्वक पढ़ाया करते थे। मैंने 45 वर्ष की कॉलेज की नौकरी में रजिस्टर के बारे में सोचा ही नहीं था। प्रिंसिपल साहिबा को यह विश्वास था कि उनके कालेज के अध्यापक ईमानदारी से पढ़ाएंगे। उन दिनों न तो किसी प्रकार के नोट्स की जरूरत होती थी और न कुंजियों की। पाठ्यक्रम में सिर्फ लज्जा सर्ग होता था और पूरी कामायिनी का अध्ययन और अध्यापन हुआ करता था। धाराप्रवाह पठन-पाठन छात्र-छात्राओं को अनेक ग्रंथ कंठस्थ करा दिया करता था। उस समय के मेरे मेधावी छात्र आज उच्च-पदासीन हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बन चुके हैं। आज के विद्यार्थी यदि इस प्रवृत्ति को महत्वपूर्ण दस्तावेज समझें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसके साथ ही एक-दो खबरें और भी छपी हैं। उनमें से एक यह थी कि प्रिंस चा‌र्ल्स राष्ट्रमंडल खेल का उद्घाटन करेंगे। महारानी तो महारानी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के रजिस्टर की बात करते हुए एक बात मैं पाठकों से यह कहना चाहती हूं कि यह विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला भले ही न बना हो, लेकिन इसका एक अपना ही इतिहास है कि आज जिस कमरे में रजिस्ट्रार बैठते हैं उसी कमरे में बैठकर लार्ड माउंटबेटन ने अपनी भावी पत्नी एडविना से प्रणय निवेदन किया था। आप जानते हैं क्या? (डॉ. राज बुद्धिराजा,दैनिक जागरण,दिल्ली,11.10.2010)

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