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11 नवंबर 2010

गांव के लिए सिर्फ साढे़ तीन साल में बनें डॉक्टर

अगर आप ग्रामीण इलाके के डाक्टर बनना चाहते हैं तो आपको साढ़े पांच साल एमबीबीएस का कोर्स करने में खपाने की जरूरत नहीं है। आप साढ़े तीन साल में भी डॉक्टर बन सकते हैं। केंद्र सरकार की तरफ से दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया गया है कि उसने बैचलर ऑफ रूरल हेल्थ केयर (बीआरएचसी) कोर्स को हरी झंडी दे दी है। इस कोर्स को करने वाले छात्र ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में काम कर सकेंगे। उच्च न्यायालय ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका का निपटारा करते हुए सरकार को कहा है कि वह इस कोर्स के लिए दो महीने में भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) से पाठ्यक्रम तैयार करवाए और छह सप्ताह में अधिसूचना जारी कर उसे लागू करे। सरकार ने सबकुछ समय से कर दिया तो अगले सत्र से यह कोर्स शुरू हो सकता है। पूर्व में उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में गैर एमबीबीएस धारक लोगों को चिकित्सा पेशा अदा करने की इजाजत देने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य पर एक अल्पकालिक पाठ्यक्रम को जरूरी बताए जाने की दलील पर पक्ष स्पष्ट करे। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा व न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से बताया गया कि उसने बीआरएचसी कोर्स को अनुमति दे दी है और एमसीआई को भी इस कोर्स को लागू करने में कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने इस कोर्स का पाठ्यक्रम निर्धारित करने के लिए एमसीआई को कह दिया है। साथ ही बताया गया कि यह कोर्स करने वाले छात्र तीन साल में अपना कोर्स पूरा कर पाएंगे और छह महीने की ट्रेनिंग करनी होगी। इसके बाद वे ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में काम कर सकेंगे। अगर ऐसे छात्र एमबीबीएस करना चाहेंगे तो उन्हें पहले पांच साल गांव में ही प्रैक्टिस करनी होगी। उसके बाद वह दो साल का एक ब्रिज कोर्स कर सकेंगे जिसके बाद उनकी पढ़ाई भी एमबीबीएस के बराबर हो जाएगी। यह पीठ मीनाक्षी गौतम की तरफ से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में यह मांग की गई है कि गैर एमबीबीएस उपाधि धारक व्यक्तियों के चिकित्सा पेशे को अपराध की श्रेणी से हटाया जाए। याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने सरकार से पूछा था कि वह बताए कि क्या उसने केंद्रीय स्वास्थ्य परिषद और कार्यबल की उन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है, जिनमें कहा गया है कि पेशेवरों के लिए तीन वर्ष का पाठ्यक्रम होना चाहिए। जबकि भारतीय चिकित्सा परिषद कार्यबल की सभी सिफारिशें स्वीकार नहीं कर रही थी(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,11.11.2010)।

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