छत्तीसगढ़ी और राज्य की दूसरी भाषा और बोलियों के इतिहास को सुरक्षित रखने में हम भले कम दिलचस्पी ले रहे हैं, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसे संजो रखा है। हाल ही में करीब सौ साल पुराने इस थाती को अमेरिका की शिकागो युनिवर्सिटी ने वेबसाइट पर पहली बार जारी किया है।
शिकागो यूनिवर्सिटी की वेबसाइट http://dsal.uchicago.edu/lsi/5463AK पर छत्तीसगढ़ी समेत राज्य की दूसरी बोलियों के कई लोकगीत और कथाएं पढ़ी और सुनी जा सकती हैं।
1914 से दस्तावेजीकरण :
अंग्रेजों के लिए भारतीय भाषाएं और बोलियां अबूझ थीं। करीब सौ साल पहले अंग्रेजों ने इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी और भाषाविद् ग्रियर्सन की सलाह पर यहां की भाषाओं और बोलियों में लोककथा और गीतों का दस्तावेजीकरण शुरू किया। 1914 से 1929 तक भारत की सैकड़ों लोककथाओं और गीतों को दर्ज करने का सिलसिला चला।
सीपी एंड बरार की 37 कथाएं
आज का छत्तीसगढ़ ब्रिटिश काल में सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार का हिस्सा था। सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार के 37 लोककथाओं और गीतों को ब्रिटिश सरकार ने 1917 में रिकार्ड किया था। आजादी के बाद ,लगभग सौ साल पुराने ये रिकाडिरंग ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित रहे। शिकागो यूनिवर्सिटी ने अपने डिजीटल साउथ एशिया लाइब्रेरी में इसे सार्वजनिक किया है।
ग्रियर्सन का सुझाव
भारतीय लोकगीतों और लोककथाओं के दस्तावेजीकरण और रिकॉर्डिग का सुझाव देने वाले सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन को भारत में भाषायी सर्वेक्षण के प्रणोता के रूप में जाना जाता है। 1851 में डब्लिन में पैदा हुए हिंदुस्तानी और संस्कृत के जानकार भाषाविद् ग्रियर्सन 1873 में पहली बार इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी बन कर भारत आए थे। उनकी ही अध्यक्षता में पहली बार 1888 में भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण हुआ, जिसमें भारत की 179 भाषाओं और 544 बोलियों की सामग्री एकत्र की गई।
बस्तर के गीत शामिल
शिकागो यूनिवर्सिटी ने जो रिकॉर्ड जारी किए हैं, उनमें बस्तर के माड़िया, गोंडी, परजा के साथ तत्कालीन सरगुजा, कोरवा के लोकगीत व कथाएं शामिल हैं। 1917 में रायपुर के बृजलाल रावत का गाया गीत- शीका म टांगे छबेला या रायपुर के ही रामानंद तिवारी की आवाज में छत्तीसगढ़ी लोककथा को सुनते हुए सौ साल पहले की छत्तीसगढ़ी के अंदाज को समझा जा सकता है।
बस्तर के काना माड़िया, गुरन सिंह हलबा, केसरी गोंड, भीमा परजा, सरगुजा के नाथु कोरवा, धनू बैगा का नाम इससे पहले शायद ही सुना गया होगा। इन सब की आवाज में छत्तीसगढ़ का इतिहास दर्ज है(संजीव पांडे,दैनिक भास्कर,बिलासपुर,23.11.2010)।

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