उत्तराखंड में प्राइमरी से माध्यमिक स्तर तक स्कूलों के मुआयने से दूरस्थ इलाकों में शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर सामने आ गई है। दस दिन तक चली इस मुहिम में औसतन 13 से 14 फीसदी विद्यार्थियों और 112 शिक्षकों का नदारद मिलना चिंता का विषय है। ध्यान देने योग्य यह है कि मुआयने के शुरुआती दिनों में शिक्षकों और विद्यार्थियों की अनुपस्थिति का आंकड़ा ज्यादा रहा, बाद में इसमें कमी आई। इससे जाहिर है कि दूरस्थ क्षेत्रों में जाने से शिक्षक कतरा रहे हैं। शिक्षकों की लगातार गैर हाजिरी से स्कूलों में विद्यार्थियों की उपस्थिति भी प्रभावित हो रही है। शिक्षा के नाम पर स्कूल महज शोपीस बन रहे हैं तो विद्यार्थियों का पलायन स्वाभाविक है। मुआयने में स्कूलों में शैक्षिक प्रशासन में खामियां भी उजागर हुई हैं। मिड डे मील नहीं बनाने की शिकायतों के साथ ही सतत मूल्यांकन, नियमित डायरी भरने और भवनों की मरम्मत व निर्माण के प्राथमिकता वाले कार्यो को तवज्जो नहीं देने के मामले सामने आए हैं। एक ओर सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान में प्राइमरी से माध्यमिक तक स्कूलों को सुविधाओं से सरसब्ज करने से लेकर शिक्षा की गुणवत्ता का ताना-बाना बुनने पर जोर है, दूसरी ओर जिन हाथों में शैक्षिक वातावरण बनाने और प्रदेश के भावी कर्णधारों को तराशने का जिम्मा है, वे स्कूलों से ही मुंह चुरा रहे हैं। इन हालात के लिए सिर्फ शिक्षक ही नहीं, बल्कि शिक्षा महकमा भी जवाबदेही से नहीं बच सकता। स्कूलों के नियमित मुआयने की परंपरा खत्म होने से विभिन्न स्तरों पर जवाबदेही भी खत्म हो गई है। सवाल यह है कि शिक्षा व्यवस्था बच्चे के लिए है अथवा महज रोजगार और अफसरों की फौज खड़ी करने के लिए बनाई जा रही है। सरकार को भी इस पर गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है(संपादकीय,दैनिक जागरण,3.11.2010)।
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