इस सप्ताह सुनिए एक गांव की कहानी। गांव का नाम है कल्याणपुर, जिला बाड़मेर। गांव के सरपंच दौला राम पटेल के मुताबिक गांव की जनसंख्या 8,000 के करीब है और यहां हर जाति के लोग रहते हैं। पहली नजर में अच्छा-खासा खाता-पीता गांव दिखता है कल्याणपुर। मुख्य जोधपुर-बाड़मेर हाई-वे पर है, बड़ा-सा बाजार है, जहां शहरी किस्म की तमाम चीजें मिल जाती हैं। नोकिया के सेलफोन, लेज के चिप्स, सोनी टीवी सब मिलते हैं। टाटा स्काई, डिश टीवी वगैरह यहां पहुंच चुके हैं और जगह-जगह दिखते हैं सैटेलाइट डिश। कोई 150 घर ऐसे हैं, जहां टीवी है।
कल्याणपुर पहुंचने के बाद मैं पहले सरपंच साहब के घर गई। छत पर एक अच्छे से कमरे में जलपान किया उनके साथ और मेरे सवालों का सिलसिला शुरू हुआ। देहातों में जब घूमती हूं, तो मेरा पहला सवाल हमेशा शिक्षा से जुड़ा रहता है, इसलिए कि मैं मानती हूं कि जब तक भारत के हर बच्चे को हम आधुनिक शिक्षा नहीं दे पाएंगे, तब तक अपना यह भारत महान विकसित देशों की गिनती में नहीं आएगा। सरपंच साहब ने बताया कि कल्याणपुर में एक सरकारी स्कूल है, लेकिन वहां पढ़ाई नाम की कोई चीज नहीं है और इस स्कूल में सिर्फ ऐसे बच्चे जाते हैं, जो गरीब घरों से आते हैं। जिनके पास थोड़े से पैसे हैं, वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कलों में भरती कराते हैं। कल्याणपुर में चार प्राइवेट स्कूल हैं, लक्ष्य ज्योति, संत राजाराम, मरुधर और लिटिल फ्लावर। इस आखिरी स्कूल में पढ़ाई का माध्यम अंगरेजी है। गांव में बिजली है, जो दिन में कुछ घंटों के लिए ही आती है। लेकिन पानी की गंभीर समस्या है। टैंकर भर-भर कर लोगों के घरों में मीठा पानी पहुंचाया जाता है, जो सिर्फ पीने के लिए इस्तेमाल होता है। नहाना-धोना और अन्य चीजों के लिए खारा पानी काम में लाया जाता है और सिंचाई के लिए पानी बिलकुल नहीं है। एक फसल होती है साल में, जो बरसात की मेहरबानियों पर निर्भर है। यहां मूंग, मोठ, बाजरा, ज्वार और तिल की फसलें होती हैं। लेकिन इस बरस की सारी की सारी फसलें बरबाद हो गई हैं, पिछले सप्ताह की बेमौसम बरसात के कारण। यह कहने के बाद सरपंच साहब मुझे बरबाद फसलों को दिखाने के लिए ले गए। हर खेत में मैंने बरबाद फसलों के ढेर देखे। क्योंकि फसलें कट चुकी थीं, बीमा मिलने की गुंजाइश नहीं है और फसलें क्योंकि खेतों में कट कर पड़ी हुई थी, बारिश ने उन्हें इतना बरबाद कर दिया कि वह चारे के काम भी नहीं आ सकती हैं। कल्याणपुर के किसान मायूस हैं, लाचार हैं, लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से मदद की बातें भी शुरू नहीं हुई हैं। न ही कोई अधिकारी या राजनीतिज्ञ इस गांव में आया है, फसलों का हाल जानने। सरपंच साहब ने कहा, ‘सिर्फ मानवेंद्र सिंह आए थे परसों। और कोई नहीं आया है।’ मानवेंद्र सिंह बाड़मेर के पूर्व सांसद हैं। उनको लोगों ने बताया कि अगर एक विशेष पैकेज बनाने की व्यवस्था नहीं की जाती है, जिसके तहत कम से कम 25,000 रुपये मुआवजा नहीं मिलता है हर किसान को, तो वह बरबाद हो जाएगा। खेतों के बाद हम पहुंचे सरकारी स्कूल में। अब तक सुबह के 10.30 बज चुके थे, लेकिन यहां एक भी टीचर नहीं पहुंची थी। सरपंच ने कहा, जोधपुर से अप-डाउन करती हैं और कभी-भी समय पर नहीं पहुंचती हैं। स्कूल के बरामदे में बच्चों का एक समूह बंद कक्षाओं के बाहर इंतजार कर रहा था, तो मैंने उनसे उनकी पढ़ाई के बारे में पूछा। सातवीं कक्षा की एक बच्ची से जब मैंने पूछा कि वह अपना नाम मेरी डायरी में लिख सकती है क्या, तो उसने हिंदी-अंगरेजी दोनों में पुष्पा लिखा। हिंदी की किताब खोलकर उसने पढ़ कर भी दिखाया लेकिन बिना कुछ समझे। मारवाड़ी में उसने सरपंच साहब को बताया कि वह हिंदी न बोल सकती है, न समझ सकती है सिर्फ पढ़ लेती है। बाकी बच्चों का भी यही हाल था।
फिर हम गए लक्ष्य ज्योति प्राइवेट स्कूल को देखने, जहां कक्षाएं भरी हुई थीं बच्चों से। इस स्कूल में 950 बच्चे पढ़ते हैं, जिनको वे अध्यापक पढ़ाते हैं, जिन्हें 5,000 रुपये से कम मासिक वेतन मिलता है। सरकारी अध्यापकों का वेतन अब 20,000 रुपये से अधिक है, लेकिन इतनी अच्छी तनख्वाह के बावजूद काम के नाम पर यह करते हैं सिर्फ खानापूर्ति। तो इस गांव की कहानी के अंत में एक छोटा-सा, लेकिन अति महत्वपूर्ण सवाल ः रद्दी सरकारी अध्यापकों को क्यों दे रहे हैं हम ऐसी तनख्वाह, जो शहरों में मिलनी मुश्किल है? और एक छोटा-सा सुझाव। जिन प्रदेशों में प्राथमिक शिक्षा का इतना बुरा हाल है, उन प्रदेशों में जरूरी हो गया है कि हम सरकारी स्कूलों में निवेश करना बंद कर दें। यही निवेश हम क्यों नहीं करते उन निजी शिक्षा संस्थानों मे,ं जो गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने के लिए तैयार हो। उत्तर भारत में प्राथमिक शिक्षा को सुधार नहीं, क्रांति चाहिए(तवलीन सिंह,अमरउजाला,20.11.2010)।
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