केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्र संघ बहाली के पीछे भले ही अलीग़ढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों का आंदोलन बताया जा रहा हो पर हकीकत यह है कि कांग्रेस को आगामी १९ नवंबर को इलाहाबाद से अपनी संदेश यात्राओं का दूसरा चरण शुरू करना था ।
सोनिया गांधी की एक जनसभा भी रखी गई थी । लंबे समय से समाजवादी छात्र सभा और कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) छात्र संघ बहाली को लेकर आंदोलनरत है । उन्नीस तारीख के कार्यक्रम में खलल न प़ड़े इसलिए कांग्रेस को कम से कम केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्र संघ बहाली का फैसला लेना प़ड़ा है । अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव बहाली का फरमान खुद सुनाएंगे ।
गौरतलब है कि अलीग़ढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के आंदोलन के पहले से इलाहाबाद में छात्र संघ बहाली को लेकर बीते तीन सालों से आंदोलन चल रहा है । यहां के आंदोलन में कांग्रेस और सपा की छात्र इकाईयां शिद्दत से जुटी हुई हैं । बीते दो-तीन महीनों से इलाहाबाद के छात्र आंदोलन ने उग्र ヒख अख्तियार कर लिया है । ऐसे में १९ नवंबर से शुरू होने वाली कांग्रेस की संदेश यात्राओं को लेकर अटकल और संशय का दौर शुरू हो गया था । इन यात्राओं को एक सार्वजनिक सभा के मार्फत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हरी झंडी दिखाने का कार्यक्रम तय किया गया था ।
हालांकि सोनिया गांधी का समय न मिल पाने के चलते उनकी जनसभा को इसी महीने के आखिरी सप्ताह तक के लिए टाल दिया गया है । यद्यपि संदेश यात्राएं १९ नवंबर से शुरू हो जाएंगी । फिलहाल इन यात्राओं का समापन कांग्रेस के स्थापना दिवस पर पश्चिम उत्तर प्रदेश में किए जाने की रूपरेखा तैयार की गई है । कांग्रेस की परेशानी का सबब यह था कि अगर छात्र संघ बहाली आंदोलन चलता रहा तो सोनिया गांधी के कार्यक्रम में खलल प़ड़ सकता है ।
गौरतलब है कि खुद इंदिरा गांधी के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में छात्र नेताओं ने खलल डालकर इस संशय को और हवा दे दी थी । यही नहीं, दस नवंबर को जवाहर लाल नेहरू की कर्मभूमि और जन्मभूमि कहे जाने वाले इलाहाबाद में कांग्रेस की राज्य इकाई की ओर से नेहरू की प्रांसगिकता पर एक ब़ड़े सेमिनार का आयोजन किया गया है, जिसमें देश के कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं के शिरकत करने की उम्मीद जताई जा रही है ।
यह कार्यक्रम भी शांति से संपन्न हो, इसलिए छात्र आंदोलन को ठंडा करना जरूरी था । गौरतलब है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से निकले हुए तमाम लोग कांग्रेस की सियासत में अहम ओहदों पर हैं(योगेश मिश्र,नई दुनिया,दिल्ली,3.11.2010) ।
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