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01 दिसंबर 2010

मध्यप्रदेशःफ़र्जी डिग्री के धंधेबाज़ों पर गिरी गाज़

छात्र-छात्राओं को गुमराह कर डिग्री बेचने का कारोबार कर रहे प्रदेश भर के 40 शिक्षण संस्थानों पर एक साथ छापामार कार्रवाई कर भारी मात्रा में दस्तावेज जब्त किए गए हैं। राजधानी की भी दो संस्थाओं से फर्जी मार्कशीट, ब्रोशर, रेट लिस्ट आदि मिले हैं। इनमें से एक संस्थान एक-एक लाख रुपए में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की डिग्री बेचता था। तहसीलदार के नेतृत्व में कार्रवाई करते हुए एक संस्थान को सील कर दिया गया है। दोनों संस्थाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है। यह कार्रवाई उच्च शिक्षा विभाग के आदेश पर की गई। उच्च शिक्षा मंत्री ने शिकायतों के आधार पर निरीक्षण दल बनाकर पूरी गोपनीयता के साथ कार्यवाही के निर्देश दिए थे। अव्वल तो इन संस्थाओं के पास राज्य शासन का अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं है। वहीं क्षेत्र के विश्वविद्यालय से भी कोई संबद्धता नहीं ली गई है। कुछ अन्य राज्यों के विवि की संबद्धता बताकर अपने सेंटर चला रहे थे। जबकि अधिकांश संस्थान मात्र डिग्री बेचने के गोरखधंधे में लगे हैं। न तो यह पढ़ाई कराते हैं और किसी तरह के प्रेक्टीकल की ही व्यवस्था है। 


छोटे-छोटे रहवासी मकानों में लग ये संस्थान छात्रों से लाखों रुपए में सौदा कर केवल डिग्री देने का काम करते हैं। राज्य शासन ने इसे छात्र-छात्राओं के भविष्य से खिलवाड़ के साथ ही मप्र विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 की धारा सात का भी उल्लंघन माना है। इसके तहत कोई भी संस्थान शासन की अनुमति और किसी विवि के क्षेत्राधिकार में दूसरे विवि के कोर्स नहीं चला सकता। डिग्रियों के गोरखधंधे में लिप्त पाई गई संस्थाओं के खिलाफ भादवि की धारा 467, 468 के अलावा 420 के तहत भी कार्यवाही की जा रही है। 

एक लाख में सिविल इंजीनियरिंग
ओम सांई इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट 25 सी सेक्टर इंद्रपुरी में छापे के दौरान चौंकाने वाले दस्तावेज हाथ लगे हैं। यह संस्थान सिविल इंजीनियरिंग और एमबीए का कोर्स कराता है, लेकिन छापे के दौरान यहां न तो क्लास मिली और न लेब। स्टाफ के नाम पर केवल एक रिसेप्शनिस्ट अदिति सिंह मिली। यह संस्थान डॉ. तरूण कुमार मंडल नामक व्यक्ति संचालित करता है। छापामार दल को यहां एक ब्रोशर मिला है, जिसमें विभिन्न डिग्रियों के रेट भी लिखे थे। इसमें सिविल इंजीनियरिंग की चार वर्षीय डिग्री की कीमत एक लाख रुपए छपी थी। पंजीयन प्रमाण पत्र की फोटो कापी दिखाकर यह संस्थान छात्र-छात्राओं को फंसाया करता था। दल ने यह कालेज सील कर दिया है। इसके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कराई जा रही है।

घर में चल रहा था कॉलेज 
भेल क्षेत्र में सेवातार्थ विनायकम ब्राइट कैरियर इंस्टीट्यूट 19 ए चिदानंद नगर में संचालित हो रहा था। इसके डायरेक्टर डॉ. त्रिभुवन शर्मा हैं। घर के बाहर लगे श्री शर्मा ने कांग्रेस नेता का बोर्ड लगा रखा था। छापे के दौरान घर में महिला और बच्चे ही थे। मगर न तो कोई क्लास रूम थे और न कोई प्रयोगशाला आदि ही थे। कालेज जैसा कोई माहौल भी नहीं था। यह संस्थान बीए, एमए सहित विभिन्न कोर्स कराता था। छानबीन में दल को यहां एक बैग में कुछ छात्र-छात्राओं की मार्कशीट व डिग्री भी मिली हैं। जबकि इसके पास राज्य शासन की एनओसी भी नहीं है। बताया जाता है कि संचालक द्वारा अन्य दस्तावेज और रिकार्ड कहीं और छुपा रखा है। आवास होने के कारण निरीक्षण दल ने इसे सील नहीं किया, लेकिन संचालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है। 

उच्च शिक्षा ने कराया था सर्वे
बताया जाता है कि बाहर के विश्वविद्यालयों की अनुमति लेकर डिग्री बेचने वाले संस्थाओं की शिकायत उच्च शिक्षा विभाग को मिली थीं। विभागीय मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने इन शिकायतों के आधार पर गुप्त सर्वे कराया था। इनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा, होशंगाबाद, धार, बड़वानी, टीकमगढ़, अनूपपुर, विदिशा, शहडोल, मुरैना, उज्जैन, सागर में करीब 40 संस्थाओं के खिलाफ जानकारी मिली थी। विभाग ने इन संस्थाओं पर कार्यवाही के लिए राज्य स्तरीय निरीक्षण दल बनाकर इसमें 56 प्रोफेसर व अधिकारियों की नियुक्ति की है। निरीक्षण के लिए इस बात का विशेष तौर पर ध्यान रखा गया है कि स्थानीय व्यक्ति कतई न रहे। यहां तक कि किसी को अपने विश्वविद्यालय क्षेत्र में भी निरीक्षण की जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। राजधानी के संस्थाओं में छापा मारने वाले दल का नेतृत्व तहसीलदार मुकुल गुप्ता ने किया। इसमें राजस्व निरीक्षक शैलेंद्र सिंह के अलावा ग्वालियर व दतिया के तीन प्रोफेसर भी शामिल थे।

जारी रहेगी कार्यवाही
उच्च शिक्षा के आदेश पर इस तरह की कार्यवाही आगे भी चलती रहेगी। गुप्त सर्वे में जिन संस्थाओं के बारे में सूचना मिली है, उन सभी पर कार्यवाही की जाएगी। विभाग द्वारा अपनी योजना को अंजाम तक पहुंचाने के लिए पूरी कार्यवाही को अंत तक गुप्त रखा जा रहा है। यहां तक कि निरीक्षण दल को भी केवल एक फोन नंबर देकर रवाना किया जाता है। मुकाम तक पहुंचने के पहले तक दल को भी नहीं पता रहता कि उन्हें कहां जाना है। पूरे निर्देश उक्त फोन नंबर पर ही दिए जाते हैं(दैनिक जागरण,भोपाल,1.12.2010)। 

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