आनंद कुमार ने फिजियोलॉजी में डाक्टरी की है, पर पिछले १० साल से अदालत में "प्रैक्टिस" करते रहे। यह बात अजीबो-गरीब है, लेकिन एक डाक्टर की दुखभरी सच्चाई है। डाक्टर आनंद कुमार वर्ष २००० में एम्स के रिप्रडक्टिव बायलॉजी प्रोफेसर के तौर पर नियुक्ति हुए थे। उसी वर्ष कैट ने उन्हें अयोग्य ठहराकर नियुक्ति को रद्द कर दिया। तब से वह चिकित्सा क्षेत्र में प्रैक्टिस करने के बजाए न्याय के लिए अदालत के चक्कर काट रहे थे। अब जाकर हाईकोर्ट से उन्हें इंसाफ मिला है।
जस्टिस प्रदीप और जस्टिस सिद्धार्थ की खंडपीठ ने एम्स को डा. आनंद की बहाली के आदेश दे दिए हैं। साथ ही उनके लिए सहानभूति भी जतायी है। खंडपीठ ने अफसोस जताया है कि "डाक्टर को न्याय पाने के लिए दस साल लंबी कानूनी लड़ाई झेलनी पड़ी। इन सालों में डाक्टर चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उपयोगी कार्य करते, पर उन्हें अदालती गलियारों के चक्कर लगाने पड़े।"
हाईकोर्ट ने डाक्टर की नियुक्ति रद्द करने वाली ट्रिब्यूनल (कैट) पर भी तीखी टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा है कि इस मामले पर विचार कर रहीट्रिब्यूनल ने केस निपटाने की मानसिकता के साथ फैसला किया। कैट ने नियुक्ति रद्द करने की जो वजह दी है, वह पूरी तरह ऊटपटांग है।
डाक्टर की नियुक्ति इस आधार पर रद्द कर दी कि उन्होंने फिजियोलॉजी में डिग्री ली थी, पर एम्स में उनकी नियुक्ति रिप्रडक्टिव बायोलॉजी के एमडी के तौर पर हुई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने देश के विभिन्ना संस्थानों का सलेबस देखा, पाया कि कहीं रिप्रडक्टिव बायोलॉजी की एमडी डिग्री नहीं दी जाती। डाक्टर की मौजूदा योग्यता उसके सामान होने के आधार पर उन्हें नियुक्त किया गया था।
इस फैसले के पीछे एम्स द्वारा दिया गया विज्ञापन भी जिम्मेदार रहा। उसमें रिप्रडक्टिव बायलॉजी में एमडी या एमएस डिग्री मांगी गई थी। उसे भ्रम की स्थिति रही। बाद में समकक्ष योग्यता होने के आधार पर २१ फरवरी २००० को डा. आनंद को नियुक्त कर दिया गया। पर कैट के गलत फैसले के कारण उनके जीवन का बहुपयोगी समय अदालती लड़ाई में बर्बाद हुआ(अवनीश चौधरी,नई दुनिया,दिल्ली,22.12.2010)।
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