चुनिंदा प्रोफेसरों को फायदा देने के लिए आनन फानन में बनाई गई वरिष्ठता सूची उच्च शिक्षा विभाग के लिए ही फांस साबित हो रही है। उच्च न्यायालय ने उस आधार को एक बार फिर नकार दिया है, जिसे शासन ने पदोन्नति का आधार बनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल समान शैक्षणिक कैलेंडर में पदोन्नत होने पर ही सीधी भर्ती वाले असिस्टेंट प्रोफेसर या प्रोफेसर की वरिष्ठता पदोन्नति वालों से ऊपर होगी। यह नियम अगले या पिछले कैलेंडर में लागू नहीं होगी। उच्च न्यायालय के जस्टिस केके लाहोटी एवं आरके गुप्ता की युगलपीठ ने 12 नवंबर को दिए आदेश में यह स्पष्ट किया है। युगलपीठ ने 11 मार्च 10 को दिए गए आदेश को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह व्यवस्था दी है। इस मामले में लगातार दूसरी युगल पीठ ने निशा तिवारी प्रकरण में दिए गए आदेश को ठुकरा दिया है। साथ ही नए सिरे से वरिष्ठता सूची बनाने का आदेश यथावत रखा है। इसके मुताबिक केवल समान शैक्षणिक सत्र में होने वाली पदोन्नति, चाहे सीधी भर्ती से हो अथवा पदोन्नत असिस्टेंट प्रोफेसर या प्रोफेसर से, में ही वरिष्ठता में पदोन्नत संवर्ग नीचे रहेगा। यह आदेश अदालत ने प्रांतीय शासकीय महाविद्यालयीन प्राध्यापक संघ के अध्यक्ष डॉ. कैलाश त्यागी एवं संजय कुमार जैन जबलपुर की याचिका पर दिया है। संगठन द्वारा आदेश की प्रति मुख्यसचिव, प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा, आयुक्त सहित सभी आला अधिकारियों को सौंप दी गई है। साथ ही वरिष्ठता सूची दोबारा बनाने की मांग की है।
शासन को लगेगी चपत :
इस आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि डॉ. निशा तिवारी प्रकरण को आधार बनाकर उच्च शिक्षा विभाग द्वारा बनाई गई वरिष्ठता सूची बेमानी है। साथ ही इसके आधार पर दिए गए लाभ भी सवालों के घेरे में आ गए हैं। हाईकोर्ट द्वारा सात मई 05 को दिए गए आदेश में अदालत ने अगले शैक्षणिक सत्र में भी सीधी भर्ती वालों को पदोन्नत प्रोफेसरों से वरिष्ठ माना था। शासन भी इस मामले में अदालत को अपने भर्ती-पदोन्नतिनियम नहीं बता सका था। साथ ही याचिकाकर्ताओं के पक्ष में ही जवाब दिया गया था। साथ ही इसके आधार पर वरिष्ठता सूची बनाकर सीधी भर्ती वाले सहायक प्राध्यापकों व प्राध्यापकों को पदोन्नति भी दे दी थी। कई प्रोफेसरों को तो सेवानिवृत्ति के बाद भी पदोन्नति देकर प्राचार्य बना दिया था। अब दोबारा वरिष्ठता सूची बनने पर कई प्रोफेसरों से वसूली की स्थिति बन सकती है। संगठन के अध्यक्ष डॉ. त्यागी का कहना है कि नौ महीने पहले दिए गए अदालत के आदेश पर विभाग ने अब तक अमल नहीं किया है। प्रमुख सचिव ने सकारात्मक जवाब दिया है। हम एक माह इंतजार करने के बाद अगली रणनीति तय करेंगे(दैनिक जागरण,भोपाल,1.12.2010)।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।