राजस्थान की 40 से अधिक जातियों सहित पूरे देश की 800 से अधिक घुमंतु और डी-नोटिफाइड जातियों का भविष्य पिछले ढाई साल से केंद्र सरकार की फाइलों में घूम रहा है। इन जातियों के अध्ययन के लिए बने राष्ट्रीय आयोग ने नौकरियों एवं चुनाव में अनुसूचित जाति और जनजाति के समान दस फीसदी आरक्षण सिफारिश कर रखी है। केंद्र की यूपीए सरकार ने बालकृष्ण रेनके की अध्यक्षता में इन जातियों के बारे में अध्ययन के लिए फरवरी, 2006 में आयोग बनाया था। आयोग ने जून 2008 में तत्कालीन सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मीरा कुमार को रिपोर्ट सौंप दी। यह रिपोर्ट दो माह बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी सौंप दी गई लेकिन इस पर कार्यवाही नहीं हुई। सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि यह रिपोर्ट अभी विचाराधीन है। इन जातियों में जगह-जगह घूमने वाले गाडि़या लुहार और सिकलीगर शामिल हैं तो पशु चराने के लिए घूमने वाले रेबारी, पेट पालन के लिए घर-घर घूमने वाले जोगी और करतब दिखाने वाले नट। ब्रिटिश हुकूमत के समय से अपराधी का दाग ढो रही कंजर और सांसी जातियां भी इसमें शामिल है। इनमें कुछ तो ऐसी हैं, जो सांप खाकर पेट भरती हैं। रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि घुमंतु,अर्द्ध घुमंत और विमुक्त जातियों की संख्या करीब दस फीसदी है, लिहाजा इन्हें आरक्षण 50 फीसदी से अधिक होने के बावजूद अजा-अजजा की तरह नौकरी में दस प्रतिशत आरक्षण मिले। लोकसभा, विधानसभा व स्थानीय निकायों में भी आरक्षण दिया जाए। अजा-जजा अत्याचार निवारण कानून का लाभ दिया जाए। अजा-अजजा की तरह अलग राष्ट्रीय आयोग बने। इसके साथ ही मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग में इन जातियों को प्रतिनिधित्व दिया जाए। राजस्थान में पिछले दो साल से आरक्षण की आग काफी जल रही है। गुर्जर समाज विशेष ओबीसी में आरक्षण को लेकर लबे समय से आंदोलन कर रहा है। पिछली वसुंधरा राजे सरकार के समय हुए उग्र आंदोलन में 70 लोग मारे गए थे। अब एक बार फिर आंदोलन शुरू हुआ है। एक तरफ प्रदेश में जहां गुर्जर आरक्षण की आग जल रही है,वहीं दूसरी तरफ राज्य में इन 40 जातियों ने अब आंदोलन की रूपरेखा बनाना शुरू कर दिया है।(नरेन्द्र शर्मा,दैनिक जागरण,जयपुर,17.1.11)
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