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04 फ़रवरी 2011

दिल्लीःसूची में नाम आने पर भी नहीं मिल रहा नर्सरी में दाखिला

शिक्षा मंत्री के दाखिला प्रक्रिया में फंसे अभिभावक जवाब भी शिक्षा मंत्री से ही चाहते हैं। बच्चों को ३०-३० स्कूल में भी नाम नहीं आने वाले तमाम अभिभावक शिक्षा मंत्री के दफ्तर और शिक्षा निदेशालय में एकजुट होकर घेराव करेंगे। अभिभावकों का कहना है कि प्रक्रिया को सरकार ने ज्यादा उलझाया है। सरकार की चुप्पी से लगता है स्कूल सरकार को चला रहे हैं।

नर्सरी दाखिला प्रक्रिया में पिस रहे अभिभावक अब शिक्षा निदेशालय का घेराव करेंगे। स्कूलों की मनमानियों को देखते हुए भी सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। मोतीबाग में रहने वाले आरके दत्ता ने बताया उन्होंने १७ स्कूलों में फॉर्म भरा, कहीं भी नाम नहीं आया। अब सरदार पटेल और होली चाइल्ड स्कूल रह गया है लेकिन वहां भी नाम आना मुश्किल है। अनिल कुमार भी यही कहना है कि सब एकजुट होकर शिक्षा निदेशालय पहुंचेगे।

अभिभावकों का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया प्वाइंट के कारण जटिल हुई है। दो दर्जन से भी अधिक स्कूलों में फॉर्म भरने के बाद भी अगर एक स्कूल में भी नाम नहीं आ रहा है तो यह अजीब है। सरकार ने प्वाइंट में भी कोई एकरूपता नहीं रखी। पूरी प्रक्रिया को स्कूलों के हाथ में सौंपने से यह हुआ है।

अभिभावकों की शिकायत का आलम यह है कि नर्सरी की वेबसाइट में चार घंटे में दो सौ से अधिक शिकायत दर्ज हुई है।


विजय नगर रहने वाले राहुल अरोड़ा और शैली अरोड़ा ने बताया कि डीपीएस रोहिणी में उनकी बच्ची का नाम आ गया, स्कूल की वेबसाइट और लिस्ट में भी नाम था, कागजों के सत्यापन के लिए बुलवाए गए ३६ अभिभावकों की सूची में भी उनका नाम था लेकिन स्कूल पहुंचने पर स्कूल प्रबंधन ने कहा कि उनका नाम गलती से चयनित छात्र की सूची में आ गया था। स्कूल ने कहा कि गलती से एल्युमनाई के प्वाइंट दे दिए गए हैं। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल ने इंटरव्यू भी लिया लेकिन अचानक मना कर दिया। स्कूल सीट खाली रखना चाहता है जिससे कि मैनेजमेंट कोटे से किसी अन्य अभिभावकों को दिया जा सके।

इन्हें मानते हैं वजह

*बढ़ती जनसंख्या, स्कूल कम

*स्कूलों में सीटें नहीं ब़ढ़ाई जा रही हैं।

*स्कूलों की ४० से ७० सीटों के लिए चार हजार से अधिक फॉर्म भरे जाते हैं। 

*सीटें कम, फिर २५ फीसदी आरक्षण

*स्कूलों की मनमानी पर सरकार बेबस

*दाखिला न होने के डर से अभिभावक दो दर्जन से अधिक स्कूलों में फॉर्म भर देते हैं, कई अभिभावक दो तीन स्कूलों में फीस भरकर सीट भर देते हैं।

*दाखिले के लिए बने प्वाइंट सिस्टम में अधिकांश अभिभावकों को सिर्फ घर से स्कूल की दूरी को छो़ड़ प्वाइंट नहीं मिले 

*सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारने से भी स्कूलों की संख्या ब़ढ़ेगी।

*सभी केंद्रीय विद्यालयों में नर्सरी होने से अभिभावकों के पास विकल्प होंगे।

स्कूलवालों का यह खेल बंद हो
एडमिशंस डॉटकॉम के वेबमास्टर सुमित वोहरा का कहना है कि सरकार को स्कूलों को ख्ुाली छूट नहीं देनी चाहिए। दाखिलों में इतनी दुविधा इसी वजह से हुई है। उनका कहना है कि अब सरकार को चाहिए कि अगले साल के दाखिलों में स्कूलों को छूट न दे, कॉमन एडमिशन फॉर्म और कॉमन एडमिशन प्वाइंट तैयार करे जिसमें स्कूलों का बिल्कुल हस्तक्षेप न हो। 

दिल्ली स्टेट पब्लिक स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष आर.सी. जैन कहते है कि शिक्षा व्यवस्था को वोट के चक्कर में सरकार बर्बाद करने पर तुली है। ४५ प्रतिशत सीटों का आरक्षण होगा तो ५५ प्रतिशत सीटों में कितने बच्चों को दाखिला दिया जा सकेगा। सरकार निजी स्कूलों पर तो गरीबों के दाखिलों के दबाव बना रही है लेकिन गरीबों के लिए तो कोई काम नहीं कर रही है। आरक्षण का विरोध दिल्ली में ही नहीं देशभर में हो रहा है। सरकार गरीबों को प़ढ़ाना ही चाहती है तो इसके लिए कई तरीके हैं। आरक्षण देने से सामान्य श्रेणी की सीटें कम ही होंगी जिससे अभिभावकों की परेशानी ब़ढ़ेगी(नई दुनिया,दिल्ली,4.2.11)

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