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02 फ़रवरी 2011

प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर चिंताजनक

स्कूली शिक्षा के संदर्भ में राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय की रिपोर्ट से जो नया तथ्य सामने आया उससे जिन राज्य सरकारों को सबसे अधिक चेतना चाहिए उनमें प्रमुख है उत्तर प्रदेश सरकार। इस तथ्य पर गहन चिंतन-मनन किया जाना चाहिए कि महज तीन साल में उत्तर प्रदेश में 12 लाख बच्चे सरकारी स्कूलों में अपनी पढ़ाई छोड़ गए। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के पढ़ाई छोड़ देने के पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन जो कारण स्पष्ट नजर आ रहा है वह है राज्य में एकल शिक्षक वाले स्कूलों का बढ़ते चले जाना। ऐसे स्कूलों का बढ़ना यह बताता है कि राज्य सरकार प्राथमिक शिक्षा के ढांचे में सुधार के लिए तैयार नहीं है। एकल शिक्षक वाले विद्यालयों में तैनात शिक्षक बच्चों को किसी तरह स्कूलों में व्यस्त रखने का जरिया मात्र बनकर रह गए हैं। यह संभव नहीं जान पड़ता कि एक शिक्षक स्कूल के सारे छात्रों की सही तरह देखरेख कर सके। यदि ऐसे स्कूलों में छात्रों की किसी तरह देखभाल हो भी जाए तो इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह शिक्षक पठन-पाठन में अपना योगदान दे सकेगा। बात केवल एकल शिक्षक वाले विद्यालयों की ही नहीं है, बल्कि जिन स्कूलों में एक से अधिक शिक्षक तैनात हैं उनकी दशा भी कोई बहुत अच्छी नहीं। आखिर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षकों से तरह-तरह के काम लेने का सिलसिला कायम है और यह एक तथ्य है कि शिक्षकों को पठन-पाठन के जितने दिन मिलते हैं उससे कहीं अधिक समय उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यो को पूरा करते बिताना पड़ता है। इन स्थितियों में यह समझ ही समझा सकता है कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर क्या होगा? बेहतर हो कि राज्य सरकार उन कारणों से अवगत हो जिनके चलते एक बड़ी संख्या में छात्र सरकारी स्कूलों में अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ रहे हैं। यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अपरिहार्य है कि राज्य सरकार प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी उपाय करे, क्योंकि ऐसा किए बिना वैसे ही आंकड़े सामने आते रहने के आसार हैं जैसे राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय की रिपोर्ट में सामने आए(संपादकीय,दैनिक जागरण,लखनऊ,1.2.11)।

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