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30 जुलाई 2011

अंग्रेजी के वर्चस्व पर लगेगी लगाम

संघ लोक सेवा आयोग की यह पहल उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में चयन की उम्मीद रखने वाले प्रतिभागी अब अपनी मातृभाषा में मौखिक साक्षात्कार देने के लिए स्वतंत्र हैं। अब तक यूपीएससी की नियमावली की बाध्यता के चलते जरूरी था कि यदि परीक्षार्थी ने मुख्य परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी रखा है तो साक्षात्कार भी अंग्रेजी में देना होगा। जाहिर है, आयोग के इस फैसले से ऐसे प्रतिभागियों को राहत मिलेगी जो अंग्रेजी तो अच्छी जानते हैं लेकिन इसके संवाद संप्रेषण व उच्चारण में उतने परिपक्व नहीं होते, जितने महंगे और उच्च दज्रे के कॉन्वेंट स्कूलों से निकलकर आए बच्चे होते हैं। यूपीएससी के निर्णय से उन चौबीस जनभाषाओं को सम्मान मिलेगा, जो संविधान का हिस्सा होने के बावजूद महत्ता और उपादेयता की दृष्टि से गौण थीं। यह निर्णय उन प्रतिभागियों को भी हीनता व अपमान बोध से मुक्त करेगा जो अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के चलते अपनी विलक्षण प्रतिभा को व्यक्त नहंीं कर पाते थे। हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की सर्वोच्च सेवाओं में नौकरी पाने के भाषाई माध्यमों को 63 साल बाद अधिकृत मान्यता मिली। देशी भाषाओं के वजूद के लिए अंग्रेजी को बेदखल करने की जरूरत है। वैसे आयोग की हमेशा यही कोशिश रही है कि परीक्षाओं का माध्यम भारतीय भाषाएं न बन पाएं और अंग्रेजी का वजूद बना रहे। इसके लिए आयोग गोपनीय चालाकियां भी बरतता रहा है। इसी साल उसने 2011 की प्रारंभिक प्रवेश परीक्षा योजना में ऐच्छिक प्रश्न-पत्र के स्थान पर दो सौ अंकों का एक नया प्रश्न-पत्र लागू कर दिया था। जिसमें तीस अंक अंग्रेजी दक्षता को समर्पित थे। हिन्दी व अन्य संविधान में अधिसूचित भारतीय भाषाओं को कोई स्थान ही नहीं दिया गया था। कुटिल चतुराई से इस प्रश्न-पत्र को केवल उत्तीर्ण पात्रता तक सीमित न रखते हुए, इसके प्राप्तांकों को प्रवीणता (मेरिट) से जोड़े जाने की चालाकी भी बरती गई थी। इससे उन अभ्यार्थियों का चयन प्रभावित होना लाजिमी था, जो भारतीय भाषाओं के माध्यम से आयोग की परीक्षाओं में बैठते हैं। यह प्रशासनिक कलाबाजी भीतरी दरवाजे से अंग्रेजी को थोपने की कोशिश का नमूना थी। इस मामले को बीते सत्र में जद (यू) के राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी ने जोरदार तरीके से उठाया था, जिसे राज्यसभा में भरपूर समर्थन मिला था। तभी सदन द्वारा इस अनिवार्यता को वापिस लेने का एक संकल्प भी पारित किया गया। अंग्रेजी का संवैधानिक महत्त्व 63 साल बाद भी इसलिए बना हुआ है क्योंकि संविधान में इसकी अनिवार्यता को आज तक बेदखल नहीं किया गया है। इसे अब भी संपर्क भाषा की संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। यदि इस बाध्यता को संसद में विधेयक लाकर तथा अधिनियम बनाकर विलोपित कर दिया जाए तो भारतीय भाषाओं को वैधानिक स्वरूप लेने में देर नहीं लगेगी। इस स्थिति के निर्माण से ग्रामीण प्रतिभाओं को खिलने और खुलने का मौका तो मिलेगा ही, देश में भारतीयभाषाओं के माध्यम से शैक्षिक समरूपता लाने का अवसर भी हासिल होगा। शिक्षा के क्षेत्र में मातृभाषाओं का आधिपत्य कायम होता है तो सरकारी पाठशालाओं में पठन- पाठन की स्थिति मजबूत होगी और अवाम को महंगी कॉन्वेंटी शिक्षा से निजात मिलेगी। वैसे भी आयोग की परीक्षाओं में 45 प्रतिशत छात्र हिन्दी माध्यम के सम्मिलित होते हैं और 40 प्रतिशत संविधान में अधिसूचित अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से बैठते हैं। लेकिन इनमें से मुख्य परीक्षा में कामयाबी बमुश्किल 40 फीसद प्रतिभागियों को मिलती है। इनमें भी 22 फीसद हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थी होते हैं। भाषाएं सामाजिक संपत्ति और वैचारिक संपदा होने के साथ संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज, तीजत् योहार और लोकोक्ति व मुहावरों को व्यक्त करने का भी माध्यम होती हैं। इसलिए यदि भाषाओं की प्रयोगशीलता, महत्ता और अनिवार्यता को नजरअंदाज किया जाएगा तो उक्त सांस्कृतिक धरोहरें भी धीरे-धीरे लुप्त होती चली जाएंगी और संस्कारों के बीज पनपने पर अंकुश लग जाएगा। सांस्कृतिक हमलों के बढ़ते इस दौर में यदि हमने भाषाओं की उपेक्षा की तो देश सांस्कृतिक पराधीनता की ओर बढ़ता रहेगा(प्रमोद भार्गव,राष्ट्रीय सहारा,30.7.11)।

6 टिप्‍पणियां:

  1. यह बहुत अच्छी खबर है।
    मैं तो ‘उस’ सिस्टम का मारा हूं।
    जब लोगों ने ‘ओह! यू आर फ़्रोम बिहार करके नाक भौं सिकोड़ लिया था। और २५० में से ८० अंक दिए थे।

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  2. Dont strike to other ,strike your mind ,give a space to self inspection why we are on this juncture ? outsiders have read our scripture,know more about us ,more than us ,but we are failed ,due to narrow thinking . See all, accept valuable. ....my best compliments for you to think at this extant . Thanks.

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  3. yah to bahut achhi khabar hai.. bus kis trah iska sahi kaarya roop mein parniti hogi, yahi mukhya baat rahegi..
    Saarthak prastuti ke liye aabhar!

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  4. यह तो बहुत अच्छी बात है ... इस जानकारी को यहाँ साझा करने के लिए आभार

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  5. यह तो बहुत अच्छी बात है
    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें

    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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