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05 सितंबर 2011

शिक्षक और शिक्षा

ऊर्जा शिक्षक और शिक्षा युग-निर्माता होने के कारण योग्य अध्यापक राष्ट्र ऋषि हैं। शिक्षा सबसे बड़ी पूंजी है। शिक्षक संस्कार के अध्याय से संस्कृति बनाते हैं। शिक्षा चरित्र निर्माण का मूल आधार है। यह जीवन को सफल और सुंदर बनाती है। इसका उद्देश्य मात्र साक्षरता नहीं, बल्कि सद्गुणों को सीखना है। लोक मंगल की भावना करने वाला संस्कार जब दक्षता की सीमा तक उद्बुद्ध होता है तो वह विद्या की कोटि में आता है। शिक्षा साधन है, विद्या साध्य और साक्षरता उपकरण। शिक्षा संस्कृति बनाती है तो विद्या विनयाधान करती है। अपने जीवन में सर्वप्रथम सदाचरण उतारकर शिक्षा देने वाले ही सच्चे शिक्षक हैं। नैतिकता शिक्षा का अंग है। शिक्षा जीवन की दृष्टि है। यह जीवन जीने की कला सिखाती है। योग्यता, प्रतिभा को चमकाने के लिए शिक्षा के अलावा दूसरा कोई माध्यम नहीं है। भेदभाव दूर करके यह दूसरों के लिए उदाहरण बनाती है। अर्थ और अधिकार के लिए बढ़ती भूख शिक्षा को खोखला करती है। योग्य शिक्षकों के अभाव में शिक्षा अपूर्ण रहती है। पंचतंत्र में कहा गया है जहां अपूज्यों की पूजा होती है और पूज्यों का अपमान होता है वहां दुर्भिक्ष, भय और मरण ये तीनों होते हैं। अध्यापक शिक्षा के आधारभूत सिद्धांतों के संरक्षण और विकास में माली का काम करते हैं। विवेकानंद ने कहा है-शिक्षा की अवहेलना करना महान राष्ट्रीय पाप है और यही हमारे अध:पतन का कारण भी है। महामना मदनमोहन मालवीय ने उद्बोधन दिया था-किसी को इस बात का दु:ख नहीं होना चाहिए कि मैं अध्यापकों के लिए बहुत मांग रहा हूं। प्राय: सभी सभ्य देशों में देश के राष्ट्रीय उत्थान में अध्यापक का स्थान श्रेष्ठ माना जाता है। इसीलिए विश्वविख्यात वैज्ञानिक पद्मश्री डॉ. लाल सिंह जैसे शिक्षाविद् काशी विवि के कुलपति बनाए गए। अधिकतर महापुरुष पहले शिक्षक ही रहे। विनोबाजी, आचार्य नरेंद्र देव, नानाजी, राधाकृष्णन, डॉ. कलाम, शंकरदयाल शर्मा ने शिक्षा और शिक्षकों के लिए जो आदर्श मूल्य स्थापित किए वे सभी के लिए प्रेरणाश्चोत हैं( डॉ. हरिप्रसाद दुबे,दैनिक जागरण,5.9.11)

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