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09 अप्रैल 2010

शिक्षा के अधिकार पर सवालःउदित राज

शिक्षा के अधिकार के तहत देश के 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का हक मिल गया है। बच्चों को स्कूल फीस, यूनिफार्म, किताबें, यातायात एवं मिड डे मील आदि का खर्च नहीं देना पड़ेगा। बच्चों को अगली कक्षा में जाने से रोका भी नहीं जाएगा। कोई स्कूल बच्चों के प्रवेश के लिए मना नहीं कर सकता। हर साठ बच्चों को पढ़ाने के लिए कम से कम दो अध्यापक होगें। प्राइवेट स्कूलों में पहली कक्षा में प्रवेश के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को 25 प्रतिशत सीटें देनी होगीं। जिन स्कूलों की बिल्डिंग एवं अन्य सुविधाएं नहीं हैं, उन्हें तीन वर्ष के अंदर पूरा कर लेना पड़ेगा, वरना मान्यता समाप्त हो जाएगी। सरकार ने मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने के अलावा कई और कदम उठाए हैं। यशपाल कमेटी की रिपोर्ट ने यूजीसी, एआईसीटीई, एमसीआई जैसी 13 नियामक संस्थाओं को समाप्त कर नेशनल कमीशन फार हायर एजुकेशन एंड रिसर्च के गठन की सिफारिश की है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने फारेन एजुकेशन प्रोवाइडर्स बिल लाने की बात कही है, जो हमारे देश में विश्वविद्यालय एवं संस्थाएं खोल सकेंगे। उपरोक्त तमाम कानून एवं प्रयासों से लगेगा कि सरकार देश में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति कर रही है। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा से दो तरह के वर्ग का जन्म होगा। दूसरे, अब बिना रोक-टोक के देश में निजी स्कूलों की स्थापना बढ़ेगी। 15-20 सालों में शिक्षा जगत में असमानता बढ़ी है। जब से निजीकरण एवं भूमंडलीकरण की लहर तेज हुई है, निजी क्षेत्र में तमाम प्राथमिक स्कूल, मेडिकल व इंजीनियरिंग कालेज एवं तमाम तरह की व्यावसायिक संस्थाएं पैदा हुई हैं, जहां दलितों एवं गरीबों के लिए शिक्षा प्राप्त करना असंभव हो गया है। क्या यूजीसी, एआईसीटीई जैसी नियामक संस्थाएं खत्म करके एक नई नियामक संस्था बना देने से भ्रष्टाचार, लाल फीताशाही, भाई-भतीजावाद आदि खत्म हो जाएगा? कुल मिलाकर शराब वही, बोतल बदलने की बात हो रही है। विदेशी विश्र्वविद्यालय एवं संस्थाएं यदि खुलती हैं, तो वे देश की सेवा की भावना से तो आएंगी नहीं। जाहिर है पैसा कमाना ही उनका मकसद होगा। कुछ कुतर्क गढ़े जा रहे हैं कि जब विदेश की तकनीक से परहेज नहीं, तो उनकी संस्थाओं से क्यों? तकनीक, ज्ञान, शोध आदि जब उसी रूप में हमारे देश में उपस्थित हैं, जिस रूप में मूल देशों में तो इन्हें पैसा कमाने के लिए क्यों आमंत्रित किया जाए? इससे देश की संस्थाओं का महत्व कम हो जाएगा। हमारे अच्छे अध्यापकों को अधिक वेतन का लालच देकर विदेशी संस्थान अपने साथ मिला लेंगे। देश को आजाद हुए लगभग 63 साल हो गए। सुधार की जरूरत तो थी, लेकिन सुधार का जो तरीका है, उससे स्थिति और भी खराब होगी। अंग्रेजों द्वारा गढ़ी गई शिक्षा प्रणाली के अंदर आमूलचूल परिवर्तन बहुत पहले कर देनी चाहिए थी। कौन नहीं जानता कि अंग्रेजों ने जिस शिक्षा पद्धति को स्थापित की थी, उससे वे सरकारी नौकर पैदा करना चाहते थे। देश के हालात के हिसाब से शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करने चाहिए थे। अंधविश्वास एवं सड़े-गले रीतिरिवाजों से अभिशप्त समाज की मुक्ति उपयोगी शिक्षा प्रणाली से ही संभव थी और है भी। चाहे मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की कवायद हो या विदेशी संस्थाओं को लाने का प्रयास, क्या इनसे समस्याओं का समाधान हो सकेगा? जब हम अतीत को देखते हैं तो कुछ मायने में पहले की ही शिक्षा प्रणाली में कुछ विशेष गुण नजर आते हैं, जैसे भारत के गांवों में राज्य सरकारों द्वारा चालित प्राथमिक स्कूल थे, जिसमें मालिक और नौकर, जमींदार और हलवाहा दोनों के बच्चे एक साथ पढ़ते थे। शहरों में भी निगम के विद्यालयों में गरीब और अमीर दोनों के बच्चे पढ़ा करते थे, क्योंकि विकल्प के रूप में निजी एवं महंगे स्कूल नहीं थे। इस विधेयक में यह भी प्रावधान है कि प्रत्येक बच्चे को तीन किलोमीटर की परिधि में ही प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इस मुफ्त एवं मौलिक शिक्षा के अधिकार से अभी भी बहुत कुछ सुधार हो सकता है यदि उस क्षेत्र में रह रहे पूंजीपतियों, अधिकारियों एवं नेताओं के बच्चों की पढ़ाई भी उन्हीं स्कूलों में अनिवार्य रूप से हो। इससे स्कूलों का स्तर अपने आप दुरुस्त हो जाएगा। सही विकल्प तो यह है कि शिक्षा समान एवं अनिवार्य होनी चाहिए। कुल मिलाकर शिक्षा के क्षेत्र में उठाए गए कदम से लगता है कि गरीब एवं दलित के लिए समान और बेहतर शिक्षा प्राप्त करने का दरवाजा बंद हो रहा है।
(दैनिक जागरण,पटना,9.4.2010)

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