राज्य के विश्वविद्यालय एवं कालेज शिक्षकों को 62 वर्ष की उम्र में ही सेवानिवृत होना होगा। पटना उच्च न्यायालय की अपीलीय खंडपीठ ने एकल पीठ के निर्णय को पलटते हुये मंगलवार को उक्त आशय का आदेश दिया। विदित हो कि मृदुला मिश्र की एकल पीठ ने पिछले वर्ष अक्टूबर माह में विश्र्वविद्यालयों एवं कालेज के शिक्षकों के पक्ष में निर्णय दिया था। एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि जो शिक्षक 31 दिसंबर 2008 एवं इसके बाद सेवानिवृत हो रहे हैं, वे 65 वर्ष की उम्र तक कार्य कर सकेंगे। अदालत के आज के फैसले से करीब एक हजार से अधिक शिक्षक प्रभावित होंगे। एकल पीठ के फैसले पर आपत्ति करते हुये राज्य सरकार ने अपील में चुनौती दी थी। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र एवं न्यायाधीश मिहिर कुमार झा की खंडपीठ ने मामले पर पहले ही सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया था। मंगलवार को अपीलीय खंडपीठ ने राज्य सरकार बनाम डा.जगदीश शर्मा व अन्य 32 मामलों में 69 पृष्ठ का फैसला सुनाया। खंडपीठ ने राज्य सरकार के विरोध को सही करार दिया। एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि यूजीसी के नक्शे कदम पर राज्य सरकार एवं विश्र्वविद्यालय को चलना चाहिए। यूजीसी ने 31 दिसंबर 2008 एवं 28 फरवरी 2009 को राज्यों के मुख्य सचिवों को सूचना दी थी कि शिक्षकों की सेवानिवृत होने की उम्र सीमा 62 से बढ़ाकर 65 की जाए। इसी परिपेक्ष्य में कई राज्य सरकारों ने शिक्षकों की सेवानिवृति उम्र सीमा बढ़ाकर 65 कर दी। एकलपीठ का यह भी तर्क था कि कालेजों व विश्र्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी है। इसके साथ-साथ शिक्षा के स्तर को बनाये रखने के लिए भी शिक्षकों की सेवानिवृत होने की उम्र सीमा बढ़ाने में हर्ज नहीं है। दूसरी तरफ आज अपीलीय खंडपीठ का कहना था कि यूजीसी ने राज्य सरकारों को जो निर्देश जारी किया वह बाध्यकारी नहीं है। राज्य सरकार यदि शिक्षकों की सेवानिवृत होने की उम्र सीमा नहीं बढ़ाना चाहती है तो इसे जबरन थोपा नहीं जा सकता। इस अपील में सभी विश्र्वविद्यालय के शिक्षक शामिल थे। अत: निर्णय का असर सभी कालेज व विश्र्वविद्यालय के शिक्षकों पर पड़ेगा(दैनिक जागरण,पटना,19.5.2010)। हिंदुस्तान की रिपोर्ट भी देखिए।

निर्णय स्वागत योग्य है!
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