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20 मई 2010

बच्चों को यंत्र न बनाएं अभिभावक

वर्तमान में अभिभावक अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों और कोचिंग क्लासेस में शिक्षा की व्यवस्था करना ही अपना कर्तव्य समझने लगे हैं। बच्चों को देने के लिए उनके पास समय ही नहीं है। बच्चों को बेहतर यंत्र बनाने के लिए ज्यादातर अभिभावकों में होड़ लगी हुई है।

सिर्फ एक ही उद्देश्य रह गया है कि किस तरह वे बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर बनाएं। इस होड़ में मनुष्य बनाना लोग भूल रहे हैं। इसका ही प्रभाव है कि राष्ट्रहित की बात करने वाले लोगों का अभाव हो गया है। ऐसा नहीं है कि नई पीढ़ी में ही राष्ट्रहित के नजरिए की कमी है। वरिष्ठ नागरिकों में भी राष्ट्रहित की दृष्टि नहीं दिखती।

बुजुर्ग अगर अपना दायित्व समझें और समाज को सही दिशा देने के लिए आगे आएं तो भी देश की दिशा और दशा बदली जा सकती है। विडंबना है कि गार्डन में घूमने और गप्पे लगाकर समय गुजारने वालों की संख्या अधिक है। यही कारण है कि समग्र समाज गलत दिशा में जा रहा है। वरिष्ठ नागरिक स्वयं एवं परिवार के प्रति अपना दायित्व पूरा कर चुके हैं। युवाओं में आज दिशाहीनता नजर आने की वजह काफी हद तक अभिभावकों एवं शिक्षकों से संस्कार नहीं मिलना है।

आखिर युवा पीढ़ी को संस्कारित करने का दायित्व किसका है, निश्चित रूप से बुजुर्ग पीढ़ी का। संस्कृत भारतीयता की पहचान है। आज विदेश के लोगों का इस देश के प्रति रुझान बढ़ने का कारण संस्कृत, वेदों एवं पुराणों में मौजूद विशद् ज्ञान ही है। संस्कृत के ग्रंथों में पूरे मानव जीवन को राह दिखाने के तत्व हैं।

संस्कृत के ग्रंथों की रचना ऋषि-मुनियों ने पूरे विश्व के मार्गदर्शन के लिए की थी। यह धर्म, जाति से परे जीवन दर्शन है। संस्कृत का उद्देश्य वैश्विक संस्कृति को पोषण देना है। दुख की बात है कि आज विदेश के लोग तो संस्कृत सीखने के लिए उत्सुक हैं, इस देश के लोग ही उपेक्षित कर रहे हैं। आज वेदों, पुराणों एवं शास्त्रों का ज्ञान देने के नाम पर खिलवाड़ किया जा रहा है।

आम लोगों को मंच के माध्यम से कथा सुनाने वाले लोगों को संस्कृत का ही ज्ञान नहीं होता। वेदों, पुराणों में निहित सही तथ्य की जानकारी नहीं रखने वाला लोगों तक किस स्तर की बातें पहुंचाएगा, यह समझा जा सकता है। कथा के नाम पर करोड़ों का व्यवसाय वे जरूर कर रहे हैं।

इसके पीछे बहुत हद तक जिम्मेदार वे लोग या संस्थाएं हैं, जो ऐसे कथावाचकों को लोगों को ज्ञान देने आमंत्रित करती हैं। देश में ऐसे विद्वानों की कमी नहीं है, जो बिना किसी लालच के लोगों को सही ज्ञान देने का काम करते हैं, आवश्यकता ऐसे विद्वानों को अवसर देने की है।

पाखंड के नाम पर करोड़ों रुपए बर्बाद करने का औचित्य समझ से परे है, लेकिन पूरे देश में आज यही हो रहा है। इस पर रोक प्रबुद्ध वर्ग की सहभागिता से ही लगाई जा सकती है। ऐसे आयोजन होने चाहिए, लेकिन मंच के माध्यम से लोगों को संबोधित करने वाले के पास व्यापक जीवन दृष्टि होनी चाहिए। मंच पर ऐसे विद्वानों को आमंत्रित किया जाना चाहिए, जो लोगों का सही मार्गदर्शन कर सके (डॉ. पुष्पा दीक्षित,दैनिक भास्कर,4 मई,2010)।

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