उत्तराखंड में, सोलह दर्जा पढ़ाई, फिर शोध और अध्ययन में उम्र खपाने के बावजूद उच्च शिक्षा पाने वालों को रोजगार नसीब नहीं हो रहा है। पढ़ाई के इस लंबे सिलसिले के दौरान उम्र जाया होने से काफी तादाद में उच्च शिक्षित युवा सरकारी डिग्री कालेजों में नियुक्ति की दौड़ से ही बाहर हो रहे हैं। इस समस्या से निपटने को शिक्षक संगठन सरकार के दर पर आवाज बुलंद करेंगे। सरकारी डिग्री कालेजों में प्रवक्ताओं की नियुक्ति के लिए आयु सीमा 35 वर्ष निर्धारित है। पड़ोसी राज्यों में यह आयु सीमा बढ़ाई गई है पर उत्तराखंड ने इस बारे में फैसला नहीं किया है। लिहाजा ऊंर्चे दर्जे तक पढ़ने और इसके बाद एम. फिल, नेट-जेआरएफ और पीएचडी समेत शोध और अध्ययन लंबी उम्र झोंकने के बाद युवाओं को इसका पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। डिग्री शिक्षकों की नियुक्ति के लिए शैक्षिक योग्यता हासिल करने में बड़ी उम्र बीत रही है। इसके मद्देनजर विवि अनुदान आयोग व विवि में शिक्षकों की नियुक्ति को आयु सीमा अधिक रखी गई है। उत्तराखंड के विषम भौगोलिक क्षेत्रों में उच्च शिक्षा हासिल करने में तमाम कठिनाइयों के बावजूद सरकार ने आयु सीमा बढ़ाने को तवज्जो नहीं दी। अलबत्ता, संविदा व विजिटिंग के तौर पर प्रवक्ताओं की नियुक्ति को पात्रों के नहीं मिलने पर सरकार को आयु सीमा में ढील देनी पड़ी है। इस परेशानी से दो-चार होने के बावजूद आयोग से नियमित शिक्षकों की भर्ती को आयु सीमा बढ़ाने की मांग नहीं मानने से अब तक काफी संख्या में युवा सरकारी नौकरी पाने से वंचित हो चुके हैं। वर्तमान में सूबे में सरकारी डिग्री शिक्षकों के 1278 रिक्त पदों में महज 568 ही नियमित नियुक्ति हैं। तकरीबन चार सौ पदों पर संविदा व विजिटिंग प्रवक्ता कार्यरत हैं। साढ़े तीन सौ से ज्यादा पद रिक्त चल रहे हैं। नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया को कई बार कदम उठाने के बावजूद आयोग को अभी तक रिक्त पद भरने में कामयाबी नहीं मिली। विशेष तौर पर आरक्षित वर्गो के पद काफी संख्या में रिक्त हैं। आयु सीमा में ढील मिलने पर काफी संख्या में युवा नियुक्ति के पात्र हो सकेंगे। इस संबंध में बेरोजगारों का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री के दर पर दस्तक देगा। राजकीय महाविद्यालय शिक्षक महासंघ (फुगटा) अध्यक्ष डा. यतीश वशिष्ठ के मुताबिक इस समस्या को शासन और मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा। संगठन आयु सीमा 40 वर्ष तक बढ़ाने की पैरवी करेगा (दैनिक जागरण,देहरादून,19.5.2010)
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