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30 जून 2010

द्रमुक की भाषाई राजनीतिःडॉ. निरंजन कुमार

उत्तर भारतीयों के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि हिंदी प्रदेश को ही पूरे देश का पर्याय मान बैठते हैं और दक्षिण की हलचल से कई बार अनजान ही रहते हैं, चाहे मुद्दा राष्ट्रीय महत्व का ही क्यों न हो। पिछले हफ्ते तमिल भाषा को लेकर तमिलनाडु के घटनाक्रम ने देश की भाषा नीति को लेकर कुछ अहम सवाल उठाए हैं। पहले तमिलनाडु का मुख्य विरोधी दल अन्नाद्रमुक और उसकी अन्य सहयोगी पार्टियों ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से भेंट कर तमिल भाषा को तमिलनाडु हाईकोर्ट की आधिकारिक भाषा घोषित करने का अनुरोध किया। कुछ दिनों से चेन्नई हाईकोर्ट और उसके मदुरै बेंच के अनेक वकीलों ने हाईकोर्ट में बहस की भाषा के रूप में तमिल को स्वीकृति दिलाने के लिए आमरण भूख हड़ताल भी शुरू कर दी थी। तमिल भाषा के मुद्दे पर अन्नाद्रमुक को राजनीतिक लाभ मिलते देख द्रमुक के प्रमुख करुणानिधि एक कदम आगे बढ़ गए। उन्होंने मांग कर डाली कि तमिल को देश की राजभाषा का भी दर्जा दिया जाए। 27 जून, 2010 को कोयंबटूर में संपन्न हुए पहले विश्व तमिल सम्मलेन में इस संबंध में एक प्रस्ताव भी पारित किया गया। हाईकोर्ट की आधिकारिक भाषा बनाने के संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 348 में उल्लिखित है कि राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से हिंदी या उस राज्य में राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किसी भाषा को उस राज्य के उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों के लिए अनुमति दे सकता है। यहां यह बताना जरूरी है कि वर्तमान में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि राज्यों में यहां की राजकीय भाषा अर्थात हिंदी का प्रयोग हाईकोर्ट की कार्यवाहियों में हो रहा है। इस संदर्भ मे 6 दिसंबर, 2006 में तमिलनाडु विधानसभा ने भी एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। इस पर केंद्र सरकार ने फरवरी 2007 को अपना जवाब भेजा कि उच्च न्यायालय की विभिन्न कार्यवाहियों, उसके आदेशों के लिए किसी क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग को अनुमति देना उचित नहीं होगा। केंद्र सरकार के फैसले के पीछे शायद यह मंशा रही थी कि चूंकि किसी राज्य के उच्च न्यायालय में सिर्फ उसी राज्य के न्यायाधीश नहीं होते, बल्कि मुख्य न्यायाधीश तो किसी अन्य राज्य का ही होता है, ऐसे में किसी अन्य राज्य का जज स्थानीय भाषा में कैसे कामकाज कर सकेगा। हिंदी को कुछ राज्यों में हाईकोर्ट की भाषा के रूप में मान्यता देने की वजह संभवत: यही रही होगी कि हिंदी उन राज्यों की राजभाषा होने के साथ-साथ देश या संघ सरकार की भी राजभाषा है। इसके अलावा भारत में लगभग सभी लोग थोड़ी-बहुत हिंदी समझते हैं। यहां केंद्र सरकार को थोड़ा लचीला रुख अपनाना चाहिए। नई तकनीकों ने अतीत की अनेक कठिनाइयों को हल कर दिया है। भाषा के संदर्भ में देखें तो विभिन्न भाषाओं के लोग एकदूसरे की भाषा को न समझते हुए भी दुभाषिये या कम्प्यूटर द्वारा अनुवाद के माध्यम से एकदूसरे को समझ लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र या विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में किसी अन्य भाषा के वक्ता को लोग साथ-साथ हो रहे अनुवाद द्वारा अपने ऑडियो फोन के माध्यम से सुनते और समझ लेते हैं। यही स्थिति अपने देश की संसद की भी है। फिर यह व्यवस्था राज्य के उच्च न्यायालयों में क्यों नहीं लागू हो सकती? न केवल तमिल, बल्कि विभिन्न राज्यों में वहां की प्रमुख क्षेत्रीय भाषा या कहें कि राजभाषा को वहां के हाईकोर्ट की भाषा के रूप में मान्यता देने में कोई हर्ज नहीं है। इससे एक तरफ क्षेत्रीय असंतोष कम होगा तो दूसरी ओर आम आदमी को जटिल न्याय प्रक्रिया को समझने में आसानी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इससे देश की एकता और अखंडता को कोई नुकसान नहीं होगा। तमिल को देश की राजभाषा बनाने संबंधी दूसरा मुद्दा जरूर संवेदनशील है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी राजभाषा है और अंग्रेजी सह राजभाषा। बहुभाषा-भाषी भारत में भाषा की समस्या थोड़ी जटिल है। यहां तीन सौ से भी अधिक भाषाएं और बोलियां हैं। ऐसे में हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने बहुत सोच-समझकर हिंदी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा का दर्जा दिया था। एक से अधिक राजभाषा होने से देश में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयों खड़ी हो जाएंगी। अधिक राजभाषाओं से राष्ट्रीय स्तर पर भाषायी धरातल पर विभिन्न राज्य सरकारों में परस्पर संवाद में दिक्कत होने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय जगत में भी हास्यास्पद स्थिति हो जाएगी, क्योंकि विश्वमंच पर राजभाषा और राष्ट्रभाषा देश की अस्मिता की प्रतीक भी होती है। आमतौर पर प्रतीक चिह्न एक ही होता है। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि अन्य भाषाएं हिंदी से निम्नतर हैं। अगर हमारा राष्ट्रीय फूल कमल है तो क्या हमें अपने गुलाब या चमेली पर गर्व नहीं है, या फिर अगर राष्ट्रीय पशु बाघ है तो हमारे हाथी क्या कम शुभंकर हैं? संविधान की 8वीं अनुसूची की सभी भाषाएं हमारी अपनी भाषाएं हैं। लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं को भी राजभाषा का दर्जा देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। केंद्र सरकर को क्षेत्रीय भाषाओं को उनके राज्यों के हाईकोर्ट की भाषा के रूप में अनुमति दे देना चाहिए। साथ ही अहिंदी भाषी राज्यों की आशंका को दूर करने के लिए संसद द्वारा एक अधिनियम बनाकर हाईस्कूल के स्तर पर हिंदी भाषी राज्यों में कोई अन्य भाषा और अहिंदी भाषी राज्यों में हिंदी की दो साल की पढ़ाई अनिवार्य कर देना चाहिए। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में इसी तरह के प्रावधान हैं। लेकिन सवाल है कि क्या राजनेताओं को जाति, मजहब, भाषा आदि की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर इन मुद्दों पर सोचने का समय है?(दैनिक जागरण,30.6.2010)

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