विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालयों तथा कॉलेज शिक्षकों के शिक्षण के क्षेत्र में उनके कामकाज को उनकी वेतनवृद्धि तथा पदोन्नति से जोड़ दिया है। इन नए मापदंडों के अनुसार शिक्षक स्वयं अपने कामकाज का वार्षिक मूल्यांकन करेंगे। यह मूल्यांकन व्याख्यानों की संख्या, प्रयोगशाला में कार्य, ट्यूटोरियल, सेमिनारों-सम्मेलनों-प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में भाग लेना, उनके पर्चों का प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशन आदि के आधार पर होगा। अतः शिक्षक अपनी मर्जी से नहीं बल्कि अपनी ठोस उपलब्धियों के आधार पर ही स्व-मूल्यांकन कर सकेंगे। बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उच्च शिक्षा से जुड़े अध्यापकों के कामकाज का निरंतर मूल्यांकन होते रहना चाहिए वरना देखा गया है कि एक बार नियुक्ति के बाद कई अध्यापक अपने काम के प्रति अगंभीर-उदासीन हो जाते हैं। वे अपने बुनियादी काम - अध्यापन को भी गंभीरता से नहीं लेते और अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए लगभग कुछ नहीं करते। इसलिए हमारे अधिकतर शिक्षा संस्थानों की स्थिति दयनीय हो चुकी है और कई विश्वविद्यालय तथा कॉलेज, जिनकी कभी प्रतिष्ठा हुआ करती थी, वह भी समाप्तप्राय है। लेकिन अध्यापन एक तरह से रचनात्मक काम भी है। अध्यापकों के कामकाज का मूल्यांकन बाबुओं के कामकाज के मूल्यांकन की तरह नहीं किया जा सकता। अनेक अच्छे अध्ययनशील अध्यापक अध्यापन तो रुचि से करते हैं मगर शोध प्रबंध लिखने आदि के मामले में उतने तत्पर या दक्ष नहीं होते लेकिन कई अध्यापक कई मोर्चों पर लगातार सक्रिय भी होते हैं। इसलिए मूल्यांकन की पद्धति में थोड़ा लचीलापन तथा रचनात्मक दृष्टि होनी चाहिए। बल इस पर दिया जाना चाहिए कि हमारे शैक्षिक संस्थानों में सिर्फ योग्य अध्यापक ही आएं। छठे वेतन आयोग ने विश्वविद्यालय-कॉलेज में अध्यापन के पेशे को पहले की अपेक्षा काफी ज्यादा आकर्षक बना दिया है मगर जरूरत इस बात की है कि इस पेशे की प्रतिष्ठा भी बढ़े ताकि प्रबंधक या प्रशासनिक अधिकारी बनने के बजाय युवा इधर आना पसंद करें। ऐसा न हो कि हर तरफ से निराश होकर ही वे इस पेशे में आएं और नौकरी की तरह अध्यापन करें। अगर मौजूदा स्थिति बदली तो इसका असर अध्ययन-अध्यापन से जुड़े सभी पक्षों पर सकारात्मक पड़ेगा(संपादकीय,नई दुनिया,दिल्ली,30.6.2010)।
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