कागज के फूल, प्यासा और साहब बीवी और गुलाम जैसी कामयाब फिल्में तो आपने देखी ही होंगी। इन फिल्मों की कामयाबी को हम सिर्फ गुरुदत्त से जोड़ कर देखते हैं, लेकिन इन फिल्मों की कामयाबी के पीछे जाने-माने सिनेमाटोग्राफर वीके मूर्ति का भी बहुत बड़ा हाथ था। उन्होंने बॉलीवुड में कई दशक का सफर तय किया। आइफा से लेकर दादा साहब फाल्के अवॉर्ड भी उन्हें मिला। सिनेमाटोग्राफी का तकनीकी कमाल निर्मल जानी की फिल्मों पत्थर के फूल, बॉर्डर और राजू चाचा में भी दिखा। संतोष सिवन ने रोजा, रुदाली के जरिए अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। उन्हें भी बॉलीवुड का हुनरमंद सिनेमाटोग्राफर माना जाता है। ये तो महज उदाहरण भर हैं। बॉलीवुड में ऐसे दर्जनों सिनेमाटोग्राफर हैं, जिन्होंने कैमरे के कमाल से रुपहले परदे पर खूब धमाल मचाया। संजय लीला भंसाली की फिल्म ब्लैक और सांवरिया भले ही कमर्शियल रूप से हिट न हुई हों, लेकिन इनकी अद्भुत सिनेमाटोग्राफी की चर्चा आज भी फिल्मी गलियारों में होती है।दरअसल, किसी भी फिल्म के निर्माण और उस फिल्म को कामयाब बनाने में एक बड़ी टीम की कड़ी मेहनत होती है। परदे पर दिखने वाले कलाकार के अलावा भी कई ऐसे लोग होते हैं, जो दिन-रात मेहनत कर फिल्म को दर्शकों तक लाने के काबिल बनाते हैं। उन्हीं में से एक होता है सिनेमाटोग्राफर। कहने का मतलब यह कि किसी फिल्म की सफलता का जितना दारोमदार एक निर्देशक, लेखक और कलाकार पर होता है, उतनी ही सिनेमाटोग्राफर पर भी होता है।
शूट के हिसाब से दृश्य तैयार करने, डायरेक्टर के हिसाब से लाइटिंग और कैमरा सेट करने की पूरी जिम्मेदारी इसी की होती है। वह अपनी बेजोड़ तकनीकी एवं कलात्मक कौशल की बदौलत डायरेक्टर एवं फिल्म के सीन की मांग के मुताबिक आर्टिस्ट को परदे पर बेहतर ढंग से पेश कर पाता है। यानी अपनी तकनीकी कला से फिल्मों में जान डालने का काम अगर कोई करता है तो वह है सिनेमाटोग्राफर। उसमें विजुलाइजेशन और लाइटिंग की बेहतरीन समझ होती है। व्यावसायिक तकनीकी ज्ञान, क्रिएटिविटी व कल्पनाशक्ति उसमें कूट-कूट कर भरी होती है। अगर आप भी फिल्म इंडस्ट्री में एक हुनरमंद सिनेमाटोग्राफर के रूप अपनी पहचान बनाना चाहते हैं तो आपको भी अपने भीतर छुपे इन गुणों को विकसित करना होगा, तभी आप स्वतंत्र रूप से फिल्मों, धारावाहिकों, डॉक्यूमेंट्रीज, म्यूजिक एलबम, वीडियो/विज्ञापन फिल्मों को बना सकते हैं या फिर प्रोडक्शन हाउसेज में बतौर सिनेमाटोग्राफर काम कर सकते हैं।
भले ही यह फील्ड ग्लैमर की चकाचौंध से भरपूर हो, लेकिन यह जान लेना चाहिए कि इसमें करियर बनाने के लिए पहली शर्त है क्रिएटिविटी और धैर्य, साथ ही आप में सीन्स, लाइटिंग, एंगल्स, फिल्टर्स, शॉट्स, मूवमेंट की समझ हो, तभी इस क्षेत्र में करियर बनाएं तो बेहतर है।
कैमरा है अहम
इसमें मोशन पिक्चर कैमरे का इस्तेमाल होता है, जो सामान्य कैमरों से अलग है। इसे कोई नौसिखिया हैंडल नहीं कर सकता। इसके लिए प्रशिक्षित होना बेहद जरूरी है। कैमरा प्लेसमेंट, सेट या लोकेशन पर लाइटिंग की व्यवस्था, कैमरा एंगल वगैरह-वगैरह को ध्यान में रखते हुए सिनेमाटोग्राफर डायरेक्टर के साथ सीन विजुलाइज करता है। दिन, रात, सुबह, शाम, बारिश, आंधी आदि का सीन कब लेना है, एक सिनेमाटोग्राफर अच्छी तरह जानता है। एक अच्छा सिनेमाटोग्राफर बनने का मूलमंत्र होता है कम समय में फटाफट काम। आपको याद होगी संजय लीला भंसाली की फिल्म सांवरिया, जो एक स्टूडियो में शूट की गई थी। इसमें लाइटिंग और विजुलाइजेशन का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है। इसी तरह कृष, कोई मिल गया, धूम और धूम-2 में दिखाए गए स्टंट सीन भी सिनेमाटोग्राफी के बेहतरीन उदाहरण हैं।
यहां आप यह भी जान लें कि लाइटिंग और कलर के बेहतरीन संयोजन के लिए कैमरा भी नवीनतम तकनीक का होना चाहिए। कैमरे से फिक्शन, एडवरटाइजिंग, डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए कहां कैमरे का कैसे इस्तेमाल करना है, इसकी समझ जरूरी है।दृश्य के माहौल को बदलने के लिए लाइटिंग का उपयोग किया जाता है, जिससे दिन और रात की अदल-बदल होती है। लाइटिंग की जरूरत हर शूट में पड़ती है। इसका काम हर तरह के लाइटिंग इफेक्ट्स को तैयार करके रखना होता है। सिनेमाटोग्राफी में प्रयुक्त होने वाला कैमरा हर कोई आसानी से नहीं खरीद सकता, क्योंकि इसकी कीमत 10 लाख रुपये से लेकर 2 करोड़ रुपये तक होती है।
योग्यता
सिनेमाटोग्राफी के लिए पहले किसी खास योग्यता की दरकार नहीं समझी जाती थी, लोग किसी सीनियर या नामी सिनेमाटोग्राफर के असिस्टेंट के तौर पर काम सीख लेते थे, लेकिन अब इससे संबंधित कुछ कोर्स शुरू हो गए हैं, जिनके लिए न्यूनतम योग्यता 12वीं अनिवार्य कर दी गई है, तभी आप डिप्लोमा, डिग्री या पीजी डिप्लोमा जैसे कोर्स कर सकते हैं। कुछ इंस्टीटय़ूट्स में सर्टिफिकेट कोर्स भी शुरू हो गया है।
कोर्स की अवधि
सिनेमाटोग्राफी में तीन वर्षीय पीजी डिप्लोमा इन मोशन पिक्चर सिनेमाटोग्राफी, पीजी डिप्लोमा इन सिनेमाटोग्राफी के अलावा एक वर्षीय डिप्लोमा और छह महीने का सर्टिफिकेट कोर्स भी उपलब्ध है। तीन वर्ष के पाठय़क्रम के लिए आवश्यक योग्यता ग्रेजुएशन है। सरकारी संस्थानों में एडमिशन के लिए एंट्रेंस टैस्ट देना होता है। डिप्लोमा और डिग्री के लिए न्यूनतम योग्यता 12वीं है। इसके अलावा प्रमुख कोर्सेज हैं सर्टिफिकेट और डिप्लोमा इन सिनेमाटोग्राफी, डिप्लोमा इन मोशन पिक्चर फोटोग्राफी, डिप्लोमा इन वीडियो कैमरा एंड लाइटिंग, डिप्लोमा इन वीडियो एडिटिंग एंड साउंड रिकॉर्डिग।
एड फिल्म मेकिंग
एड फिल्म मेकिंग का क्षेत्र भी आज प्रगति के नये आयाम लिख रहा है। विज्ञापन ही है, जिसके जरिए लोगों तक न सिर्फ जानकारी पहुंचाई जाती है, बल्कि आकर्षक और जानकारीपरक प्रस्तुति से लोगों को प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल के लिए उत्सुक किया जाता है। मिसाल के तौर पर वोडाफोन का कुत्ता, जूजू और ठंडा मतलब कोकाकोला।
2 से 3 घंटे की अवधि वाली फिल्मों की बनिस्बत विज्ञापन फिल्म मेकिंग कुछ सेकंड या मिनटों की होती है, लेकिन उन चंद सेकंड में ही सारी बातें बयान कर दी जाती हैं। चंद सेकंड के विज्ञापन कैसे दर्शकों के मन-मस्तिष्क में घर कर जाते हैं, ये तो किसी विज्ञापन की लोकप्रियता से पता चलता ही है। एड फिल्म मेकिंग में भी सिनेमाटोग्राफर अपना अहम रोल अदा करता है। इसमें उन लोगों की ज्यादा डिमांड है, जो लीक से हट कर कुछ सोचते हैं।
सिनेमाटोग्राफी के प्रमुख संस्थान
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से संबद्घ यह संस्थान 1960 से फिल्मी दुनिया में करियर बनाने वालों का प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान है। सुभाष घई, नसीरुद्दीन शाह, जया भादुड़ी, विदु विनोद चोपड़ा जैसे लोगों ने प्रशिक्षण लेकर बॉलीवुड में खूब नाम और दाम कमाया है। डायरेक्शन/ सिनेमाटोग्राफी/ एक्टिंग/ स्क्रीन प्ले राइटिंग यहां के प्रमुख पाठय़क्रम हैं। इसके किसी भी कोर्स में एडमिशन के लिए एंट्रेंस टैस्ट देना होता है।
पता : लॉ कालेज रोड, पुणे, महाराष्ट्र
वेबसाइट : http://www.ftiindia.com/
सिनेमाटोग्राफी के अन्य प्रमुख संस्थान
सत्यजित रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट, कोलकाता
वेबसाइट : http://www.srfti.gov.in/
नेशनल एकेडमी ऑफ मीडिया एजुकेशन, मुंबई
वेबसाइट : http://www.thename.co.in/
व्हिसलिंग वुड्स इंटरनेशनल, मुंबई
वेबसाइट : http://www.whistlingwoods.net/
एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन,
नोएडा, उत्तर प्रदेश
वेबसाइट : http://www.aaft.com/
सेंटर फॉर रिसर्च इन आर्ट ऑफ फिल्म्स एंड टेलीविजन (क्राफ्ट), नई दिल्ली
वेबसाइट : http://www.log2craft.org/
कोचिंग संस्थान
सिनेमाटोग्राफी के लिए कोचिंग संस्थान की दरकार नहीं है। अनुभव हासिल कर चुके सिनेमाटोग्राफर से ट्रेनिंग ली जा सकती है। कोई कोचिंग संस्थान जैसा कॉन्सेप्ट अभी कुछ नहीं है।
स्कॉलरशिप
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया में 21 व्यक्ति/संस्थाओं द्वारा स्कॉलरशिप दी जाती है। फाल्के मेमोरियल ऑनर और डॉल्बी स्कूल स्कॉलरशिप प्रमुख हैं। सत्यजित रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट, कोलकाता में यहां के योग्य छात्रों को स्कॉलरशिप दी जाती है। यह 1500 से लेकर लाख रुपए तक हो सकती है।
एजुकेशन लोन
सिनेमाटोग्राफी में जो विद्यार्थी करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए लोन मिल सकता है, बशर्ते संस्थान तथा वह पाठय़क्रम केंद्र सरकार या राज्य सरकार से मान्यताप्राप्त हो। वैसे लोन के लिए किसी भी नेशनलाइज्ड बैंक से संपर्क किया जा सकता है, नियम व शर्तों के साथ। फिल्म एंड टेलीजिवन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया, पुणे और सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट, कोलकाता के लिए सभी नेशनलाइज्ड बैंक लोन देते हैं।
नौकरी के अवसर
पूरी दुनिया में सबसे अधिक फिल्म और सीरियल भारत में बनते हैं। अगर भारतीय सिनेमा जगत पर नजर डालें तो यहां हर साल अलग-अलग भाषाओं में आठ सौ से अधिक फिल्में बनती हैं। अमूमन एक फिल्म में दो सौ से अधिक लोगों का योगदान होता है, इसलिए डायरेक्टर, प्रोडय़ूसर, एक्टर, सिनेमाटोग्राफर, म्यूजीशियन, टेक्निशियन के अलावा जूनियर स्टाफ के लिए भी बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर हैं। सिनेमाटोग्राफर के तौर पर फिल्म, टीवी, प्रोडक्शन हाउसेज, टीवी सीरियल में स्वतंत्र रूप से या किसी डायरेक्टर के साथ जुड़ कर भी काम किया जा सकता है। अनुभव हो जाने के बाद फ्रीलॉन्स सिनेमाटोग्राफर के रूप में अपना नेटवर्क विकसित कर स्वतंत्र रूप से भी काम कर सकते हैं।
वेतन
फिल्म इंडस्ट्री में कई सिनेमाटोग्राफर हैं, जिनकी कमाई आज लाखों में है। यदि आप किसी फिल्म या सीरियल को शूट कर रहे हैं तो 10 से लेकर 30 हजार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से पैसा मिल सकता है। वैसे शुरुआती वेतन 8 हजार से 10 हजार है। 5 साल के तजुर्बे के बाद आपको मनमुताबिक वेतन मिल सकता है, 50 हजार से 1 लाख तक। इसमें फ्रीलॉन्स वर्क की भी काफी गुंजाइश है। खुद का प्रोडक्शन हाउस या विज्ञापन फिल्म बना कर भी वारे-न्यारे किये जा सकते हैं।
परामर्श
अशोक सिंह, करियर कंसल्टेंट
ग्यारहवीं का छात्र हूं। सिनेमाटोग्राफी में करियर निर्माण के लिए क्या करना चाहिए?
सचिन जैन, विश्वास नगर, दिल्ली
फिल्म और टेलीविजन के कार्यक्रमों के निर्माण में सिनेमाटोग्राफर की अहम् भूमिका होती है। डायरेक्टर की सोच को फिल्मी कैनवास पर उतारने का समूचा दायित्व सिनेमाटोग्राफर का होता है। आमतौर से लोग कैमरामैन और सिनेमाटोग्राफर के कार्यकलापों में भेद नहीं कर पाते। असल में सिनेमाटोग्राफर का काम कैमरामैन की तुलना में कहीं अधिक टेक्निकल और क्रिएटिव होता है। प्रमुख संस्थानों में एफटीआईआई (पुणे), सत्यजित रे फिल्म एंड टीवी इंस्टीटय़ूट (कोलकाता), फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट (चेन्नई) आदि का उल्लेख पोस्ट ग्रेजुएट सिनेमाटोग्राफी कोर्सेज के लिए किया जा सकता है। इनके अलावा निजी संस्थान भी 12वीं के बाद इस प्रकार के कोर्स संचालित करते हैं।
हिस्ट्री (ऑनर्स) का छात्र हूं। सिनेमाटोग्राफी के बाद क्या मैं एड फिल्मों में भी करियर बना सकता हूं?
ललित सूरी , ईस्ट ऑफ कैलाश, दिल्ली
नि:संदेह अच्छा सिनेमाटोग्राफर बेहतरीन फिल्मकार बन सकता है। एड फिल्में बनाने में क्रिएटिविटी के साथ सिनेमाटोग्राफी की स्पेशल टेक्नीक्स का प्रयोग सबसे खास पहलू कहे जा सकते हैं। मीडिया क्षेत्र जिस तरह से बूम पर है, उसमें भी अच्छे सिनेमाटोग्राफरों की मांग आने वाले दिनों में तेजी से बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
क्या बी-कॉम के बाद सिनेमाटोग्राफी को बतौर करियर अपनाया जा सकता है?
सौरभ सिन्हा, न्यू राजेन्द्र नगर, दिल्ली
ये दोनों बिल्कुल अलग प्रकार के क्षेत्र हैं। बी-कॉम के कोर्स के साथ पार्टटाइम सिनेमाटोग्राफी कोर्स करने के बारे में भी आप सोच सकते हैं। प्रयास करें कि ऐसे संस्थान का चयन करें, जिसमें कैमरा, स्डूडियो और अनुभवी सिनेमाटोग्राफर की सेवाएं उपलब्ध हों। बाद में आप स्वयं कैमरा किराये पर लेकर पर्याप्त अनुभव उठा सकते हैं।
हिन्दी (ऑनर्स) का छात्र हूं। कहानी लेखन का शौक है। एड फिल्म प्रोडक्शन एवं लेखन के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए कहां से ट्रेनिंग लूं?
विमलकांत, शेख सराय, दिल्ली
बुनियादी रूप से आपको स्क्रिप्ट लेखन की ट्रेनिंग के बारे में सोचना चाहिए। कहानी को फिल्मों/ वृत्तचित्रों/ धारावाहिकों की आवश्यकता के अनुसार स्क्रिप्ट के रूप में ढालने के लिए इस प्रकार की विशिष्ट ट्रेनिंग अत्यावश्यक है। फिलहाल आप अपना ग्रेजुएशन कोर्स करते हुए दिल्ली स्थित किसी निजी मीडिया संस्थान में उपलब्ध पार्टटाइम ट्रेनिंग का लाभ उठा सकते हैं।
एक्सपर्ट व्यू
इंस्टीटय़ूट सिर्फ बेसिक जानकारी ही देगा
नरेश शर्मा, (सिनेमाटोग्राफर एवं डायरेक्टर, क्राफ्ट फिल्म्स)
एक अच्छे सिनेमाटोग्राफर में तीन तरह के गुण होने चाहिए। सर्वप्रथम उसमें विजुलाइज करने की क्षमता और समझ हो, दूसरी अहम बात यह कि कैमरा मूवमेंट और लाइटिंग सेंस की बारीकियों से अवगत हो, तीसरी बात यह कि बेहतर लोकेशंस का चुनाव और बैकग्राउंड कैसा है, इस पर भी सिनेमाटोग्राफर की नजर होनी चाहिए। कम समय में बेहतर से बेहतर काम करना भी एक अच्छे सिनेमाटोग्राफर की खासियत होनी चाहिए। डायरेक्टर क्या चाहता है, वह उसके मुताबिक काम करे, न कि अपनी मर्जी उस पर थोपे। इस क्षेत्र में करियर बनाने वालों से मेरी राय है कि वह पहले कोर्स के बारे में पता कर लें। प्लेसमेंट के चक्कर में न पड़ें। इंस्टीटय़ूट के इन्फ्रास्ट्रक्चर को देखें, अपनी क्षमता और योग्यता को पहचानें, तभी इस फील्ड में करियर बनाने की सोचें। कोई इंस्टीटय़ूट या कॉलेज आपको सिर्फ बेसिक जानकारी ही देगा, बाकी आपको खुद करना है। इस फील्ड में प्रेक्टिकल ज्ञान जरूरी है। अच्छे सिनेमाटोग्राफर के संपर्क में रहें, वह भी आपको बहुत कुछ सिखा देगा। यूं तो सीखने के लिए पूरी उम्र कम होती है, कम से कम दो साल तक धैर्य से काम करें। हुनर एक दिन में नहीं आता, इसके लिए लंबे अनुभव और जुनून की जरूरत होती है। जॉब की कोई कमी नहीं है। टीवी चैनल्स/ विज्ञापन फिल्मों/ म्यूजिक वीडियो/ डॉक्यूमेंट्री फिल्म्स/ बॉलीवुड/ हॉलीवुड, हर जगह जॉब की भरमार है। इसके अलावा यह फील्ड फ्रीलॉन्सर्स के काफी शाइनिंग है। जैसे-जैसे तजुर्बा होगा, आपके काम को लोग पहचानेंगे। बॉलीवुड/ टेलीवुड में आपके रास्ते खुलेंगे। आपको असाइनमेंट देंगे। एक दिन के असाइनमेंट के लिए आपको अच्छी राशि का भुगतान करेंगे।
सफल शख्सियत
डायरेक्टर और राइटर का चश्मा है सिनेमाटोग्राफी
संतोष, फ्रीलॉन्स सिनेमाटोग्राफर
मैंने सत्यजित रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट कोलकाता से तीन साल का पीजी डिप्लोमा इन मोशन पिक्चर सिनेमाटोग्राफी का कोर्स किया। कोर्स करने के बाद मैं मुंबई चला गया। वहां मुझे पहला असाइनमेंट 5 हजार का मिला। मैं विज्ञापन फिल्म और फिल्मों के लिए ही काम करता हूं। मैंने बॉबी बेदी, अनिल मेहता और किरण देवहन के साथ काम किया है। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला है। फिलवक्त मैं दि लकी 13 की शूटिंग में व्यस्त हूं।
सिनेमाटोग्राफी पूरी तरह फिक्शन और नॉन फिक्शन होती है। फिल्मों में फिक्शन और डाक्यूमेंट्री फिल्मों में नॉन फिक्शन काम होता है। सिनेमाटोग्राफी पूरी तरह सपनों की दुनिया में गोते लगाने जैसा है। जैसे एक बच्चा सपना देखता है और उस सपने का जिक्र अपने दोस्तों से करता है और फिर उस पर फिल्म बनाई जाए, वही सिनेमाटोग्राफी है। यानी जो डायरेक्टर या स्क्रिप्ट राइटर सोचता है, उसे परदे पर लेकर आता है सिनेमाटोग्राफर। जैसे रात 11 बजे क्या लाइटिंग होगी, सुबह का नजारा कैसा होगा, बारिश या शाम के सीन को कैसे शूट करना है, यह सिनेमाटोग्राफर ही तय करता है। यह बहुत ही शाइनिंग फील्ड है, लेकिन जरूरत है रोज नया सीखने की। मैं हर रोज कुछ न कुछ सीखने की कोशिश करता हूं।
एड फिल्म मेकिंग, फिल्म, प्रोडक्शन हाउसेज में तो रोजगार हैं ही, फ्रीलॉन्स वर्क बहुत ज्यादा है। एक दिन के असाइनमेंट का 10 से 20 हजार तक मिल जाता है(फजले गुफरान,Hindistan,Delhi,30.6.2010)।
इस केरियर के विषय में विस्तृत जानकारी का आभार.
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