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28 जून 2010

निजी स्कूल में गरीब

हमारे देश का अमीर वर्ग साधारणतः यह सोचता है कि सामाजिक जिम्मेदारी निभाना सरकार का कर्तव्य है और उसका अपना कर्तव्य है मोटा मुनाफा कमाना। इस प्रवृत्ति के दर्शन हर जगह होते हैं। हमारे देश में नारायणमूर्ति जैसे कुछेक आधुनिक धनपतियों को छोड़ दें तो अधिकतर विशुद्ध पैसा कमाने में लगे हैं। स्थिति यह है कि सरकार से किसी भी तरह का लाभ लेने में वे बेहद आगे हैं मगर उसके बदले में एक पैसा भी देने में, समाज के गरीब तबकों के लिए कुछ करने में उनकी जान निकलती है। दिल्ली के प्रसिद्ध अपोलो अस्पताल का मामला बहुचर्चित है जिसने दिल्ली सरकार को प्रतीकात्मक धन देकर मौके की अच्छी बड़ी जमीन हासिल कर ली मगर इस शर्त को निभाने से उसने इनकार कर दिया कि गरीबों के लिए निश्चित प्रतिशत बिस्तर वहां सुरक्षित रखे जाएंगे और उनका इलाज मुफ्त किया जाएगा। यही हाल दिल्ली के ३९४ उन पब्लिक स्कूलों का भी है, जिन्होंने सरकार से सस्ती या नाममात्र की दरों पर महंगी जमीनें हासिल कर रखी हैं मगर इनमें से ज्यादातर ने शर्त के मुताबिक २० प्रतिशत स्थान गरीब वर्ग के बच्चों को देने से इनकार कर दिया है। इस बारे में इन स्कूलों ने न केंद्रीय सूचना आयोग की सुनी, न दिल्ली उच्च न्यायालय की और अब नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक की, २५ बड़े निजी स्कूलों के बारे में जांच रिपोर्ट भी यही बताती है। इस अखबार ने लगातार तीन दिनों तक नियंत्रण तथा महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि किस तरह इन २५ में से ज्यादातर स्कूल गरीब छात्रों को अपने यहां प्रवेश देने को अब भी तैयार नहीं हैं। कुछ स्कूलों ने तो- रिपोर्ट के अनुसार- एक भी गरीब छात्र को मुफ्त शिक्षा देनी जरूरी नहीं समझी है जबकि दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम १९७३ के अनुसार ही यह जरूरी है। लेकिन जैसा कि सभी जगह होता है, सरकारी विभाग ताकतवरों को बचाने में, उनके हित पूरे करने में व्यस्त रहते हैं। उन्हें अपनी ही सरकार के द्वारा बनाए नियम-कायदों का स्मरण नहीं रहता। स्मरण दिलाया जाए तो भी याददाश्त के बुझे हुए बल्ब नहीं जलते।

दिल्ली की सरकार ने निजी स्कूलों को सस्ती जमीन देने में न कभी कंजूसी की, न कोताही बरती लेकिन जमीन जिन नियमों के अधीन दी, वे नियम क्या कहते हैं, इस पर कभी गौर नहीं किया क्योंकि गौर न करना ज्यादा फायदेमंद रहता है। अगर नियमों की अनदेखी करने के लिए सीधे तौर पर भ्रष्टाचार नहीं भी किया जाता तो अप्रकट तौर पर भ्रष्टाचार किया जाता है। अफसर और मंत्री अपने और अपनों के बच्चों को इन "प्रतिष्ठित" स्कूलों में प्रवेश दिलाने के तौर पर नियमों की उपेक्षा कर कीमत वसूल करते हैं वरना क्यों ऐसा है कि ३७ वर्ष पुराना कानून लागू करवाने की जहमत दिल्ली की किसी भी सरकार के किसी भी मंत्री ने आजतक नहीं उठाई। यह नियम लागू हो इसके लिए अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा, केंद्रीय सूचना आयोग को दखल देना पड़ा। पिछले साल सितंबर में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता और वकील अशोक अग्रवाल को जाना पड़ा, यह शिकायत करने के लिए कि निर्धन बच्चों को इन स्कूलों में प्रवेश देने की जो नीति बनाई गई है, उसका पर्याप्त प्रचार दिल्ली सरकार करे, जिसने कि इसकी जरूरत नहीं समझी है। फिर उसी साल दिसंबर में केंद्रीय सूचना आयोग को भी यही बात कहनी पड़ी। यह हाल तो खुद सरकार का है जो किसी की भी सुनने को तैयार नहीं है। दिल्ली के निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को २० प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है और इसे लागू किया जाना चाहिए, यह बात दिल्ली सरकार को जैसे खुद मालूम नहीं थी, यह बात उसे केंद्र सरकार ने आंखों में उंगली डालकर २००७ में बताई।

इस सबके बाद जब नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक से जांच रिपोर्ट तैयार करने को कहा जाता है तो फिर से नतीजा सिफर निकलता है। यह पता चलता है कि सेंट जेवियर स्कूल, कॉन्वेंट जीसस एंड मैरी स्कूल, फ्रैंक एंथनी पब्लिक स्कूल, प्रेजेंटेशन कॉन्वेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल जैसे कई स्कूलों ने इतना सब हल्ला होने के बावजूद एक भी गरीब छात्र को प्रवेश नहीं दिया है।

लेकिन गड़बड़ियां करके लाखों-करोड़ों की कमाई करने में ये स्कूल कभी पीछे नहीं रहे। दिल्ली स्कूल शिक्षा नियम, १९७३ के मुताबिक किसी भी स्कूल परिसर में व्यावसायिक गतिविधि नहीं चलाई जा सकती लेकिन किताबें और वर्दी बेचकर, कैंटीन आदि खोलकर तमाम चीजों को बाजार से बेहद ऊंचे दामों पर बेचकर मुनाफा बटोरने में इन्होंने जरा भी ढिलाई नहीं बरती। जब केंद्र सरकार ने छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए फरवरी, २००९ में निर्देश दिए कि शिक्षकों तथा कर्मचारियों को इसकी बकाया राशि का भुगतान स्कूलों के रिजर्व तथा सरप्लस फंड से किया जाए तो भी ऐसा नहीं किया गया बल्कि एरियर देने तथा अधिक तनख्वाहें देने के नाम पर छात्रों के अभिभावकों से मोटी कमाई की गई।

और जाहिर है कि दिल्ली सरकार सब कुछ आराम से देखती रही। निजी क्षेत्र की गड़बड़ियों पर ध्यान देना सरकार अपना काम नहीं मानती लेकिन इस क्षेत्र की "मदद" करना हो, उस पर सरकारी धन लुटाना हो तो सरकार एकदम तैयार रहती है। यह स्थिति क्या दिखाती है कि गरीब बच्चों को उनका हक दिलाने में देश की अन्य राज्य सरकारों की तरह इस सरकार की भी कोई दिलचस्पी नहीं है। बस अदालत का या सूचना आयोग का या नियंत्रक महालेखा परीक्षक का डंडा पड़ता है तो जरा सी हरकत होती है, फिर सरकार उसी गहरी नींद में सो जाती है। इस मामले में इस सरकार का रुख भी अमीर वर्ग के रुख से क्या भिन्न है?(संपादकीय,नई दुनिया,दिल्ली,28.6.2010)

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