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27 जुलाई 2010

उत्तराखंडःहर साल गंवाने पड़ेंगे 4000 पद

बेरोजगारों के लिए कुछ खास करने की सरकार की चाह हजारों रोजगार के दरवाजे तो खोल रही है पर मामले में छठे वेतन आयोग की संस्तुतियां के ब्रेक से पार पाने की चुनौती है। रिक्त साठ हजार पद भले ही भरे न जाएं, लेकिन उत्तराखंड को हर साल दो फीसदी तकरीबन चार हजार पद गंवाने पड़ेंगे। प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मिशन-2012 के मद्देनजर चालू वर्ष की अहमियत बढ़ गई है। विशेषकर रोजगार के नजरिए से बेरोजगारों को कुछ हाथ लगने जा रहा है। खराब माली हालत और कर्ज के बढ़ते जंजाल के बीच सरकार कुछ खोकर पाना है का ताना-बाना बुन रही है। इस खेल में रोजगार तो मिलेगा, साथ ही उसमें आश्चर्यजनक ढंग से कटौती होना भी तय है। समूह-ग के तकरीबन 12 हजार पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का फैसला कैबिनेट ले चुकी है। महकमों में रिक्त पदों के लिए भर्ती की एकीकृत परीक्षा का जिम्मा प्राविधिक शिक्षा परीक्षा परिषद को सौंपा गया है। प्रदेश में फिलवक्त समूह क से लेकर घ तक तकरीबन 2.10 लाख स्वीकृत पद हैं। छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों के बाद वेतन में उछाल से कार्मिक निहाल हो गए पर नए पदों के सृजन और मौजूदा रिक्त पदों को सौ फीसदी भरने पर ब्रेक लग चुका है। सरकार को हर साल अब दो फीसदी पदों की कटौती करनी होगी। इसकी गाज सबसे ज्यादा समूह ग और घ के पदों पर पड़ेगी। सरकार ने योजना आकार में इसके संकेत दे दिए हैं। सरकारी सूत्रों की मानें तो खोकर पाने की यह स्थिति बेहतर वित्तीय प्रबंधन और बेरोजगारी की खाई पाटने के लिए है। बजट में प्राइमरी, सेकेंडरी और टरसरी सेक्टर में विशेष रूप से सेकेंडरी सेक्टर से जुड़ी अवस्थापना सुविधाओं पर फोकस ज्यादा है। सूबे की बुनियादी जरूरत पूरा करने को अन्य दो सेक्टरों को कम तवज्जो देने की रणनीति है। इसका असर रोजगार में कटौती के रूप में नजर आएगा। इसके एवज में अवस्थापना सुविधाओं को बढ़ाने की मशक्कत की जा रही है। इस वजह से मौजूदा समय में कुल रिक्त साठ हजार पदों को समय पर नहीं भरा गया तो इनमें कटौती होना तय है। अन्यथा हर साल तकरीबन चार हजार पदों से हाथ धोना पड़ेगा(रवीन्द्र बड़थ्वाल,दैनिक जागरण,देहरादून,27.7.2010)।

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