राज्य में उच्च शिक्षा का कोई पुरसाहाल नहीं है। इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि सूबे में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नियोजन व समन्वय के साथ सलाहकार की भूमिका निभाने वाली राज्य उच्च शिक्षा परिषद का पिछले ढाई वर्षों से गठन ही नहीं हो सका है। नियमानुसार परिषद की बैठक हर तिमाही में होनी चाहिए लेकिन दो वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद भी परिषद की कोई बैठक नहीं हो पायी हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के प्रावधानों पर अमल करते हुए उत्तर प्रदेश राज्य उच्च शिक्षा परिषद अधिनियम, 1995 बनाया गया था। अधिनियम के तहत प्रदेश में राज्य उच्च शिक्षा परिषद के गठन का प्रावधान है। इस परिषद पर राज्य में उच्च शिक्षा के उन्नयन के लिए नीतियां निर्धारित करने व उनके नियोजन की जिम्मेदारी है। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय का दायित्व भी परिषद पर है। शुरुआत में राज्य उच्च शिक्षा परिषद में 15 सदस्य होते थे। 2007 में उप्र राज्य उच्च शिक्षा परिषद अधिनियम में संशोधन कर उच्च शिक्षा परिषद में उपाध्यक्ष के दो पद जोड़ गए। परिषद के वर्तमान स्वरूप में उसका अध्यक्ष किसी विश्वविद्यालय का कुलपति होता है। उपाध्यक्ष के दो पदों पर शासन के नामित प्रतिनिधि हैं। इसके सदस्यों में उच्च शिक्षा, वित्त व नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव, निदेशक उच्च शिक्षा, निदेशक प्राविधिक शिक्षा, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का नामित एक प्रतिनिधि शामिल हैं(राजीव दीक्षित,लखनऊ,दैनिक जागरण,6.7.2010)।
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