सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न विद्यार्थी उपभोक्ता है और न ही विश्वविद्यालय सेवाप्रदाता, जिसे सेवा में कमी के लिए उपभोक्ता शिकायत निवारण मंच पर घसीटा जा सके। विद्यार्थी ने जो परीक्षा दी है उसकी डिग्री उसे प्रदान करने का निर्देश देने की मांग भी नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी (एमडीयू) की याचिका को स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। एमडीयू ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसे सुरजीत कौर नामक छात्रा को बीएड डिग्री प्रदान करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि न छात्रा सुरजीत कौर उपभोक्ता है और न ही एमडीयू कोई सेवा प्रदान करती है।
जस्टिस बीएस चौहान और स्वतंत्र कुमार की बेंच ने कहा कि बीएड डिग्री प्रदान करने का छात्रा का दावा यूनिवर्सिटी को अपने नियमों के खिलाफ काम करने का निर्देश देने जैसा है।
सुरजीत कौर ने यूनिवर्सिटी से यह तथ्य छिपाया था कि उसने 1994-95 में एक साथ दो परीक्षाएं दी थीं। नियमानुसार विद्यार्थी को इसकी अनुमति नहीं है। विद्यार्थियों और विश्वविद्यालयों के विवादों को निपटाने में उपभोक्ता संरक्षण कानून लागू किया जा सकता है या नहीं इसे सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया।
कोर्ट ने कहा कि अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए जब कोई एग्जामिनेशन बोर्ड परीक्षा आयोजित करता है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह उम्मीदवार को सेवा प्रदान कर रहा है। न ही परीक्षार्थी बोर्ड से कोई सेवा ले रहा है।
परीक्षा में बैठने वाला उम्मीदवार वह व्यक्ति है जो कोई कोर्स करने के बाद बोर्ड से आग्रह करता है कि उसकी परीक्षा ली जाए। ताकि यह पता लग सके कि कोर्स में सफल घोषित होने के लिए उसने पर्याप्त ज्ञान अर्जित कर लिया है या नहीं। यदि हां तो फिर यह भी निर्धारित किया जाए कि दूसरे परीक्षार्थियों के मुकाबले उसकी क्या पोजिशन या रैंक रही(राकेश भटनागर,दैनिक भास्कर,दिल्ली,21.7.2010)।
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