समय के ठहरने का आशय है हमारे मन-मस्तिष्क में उसका पुख्ता मुकाम। जीवन में कड़वी-मीठी स्मृतियों का स्थान है। यह समय के सुप्रबंधन एवं कुप्रबंधन, दोनों ही स्थितियों में होता है। फिर भी समय के सुप्रबंधन से संबंधित समय का ठहराव हमें प्रिय होता है। बुरी यादों को हम भूलना चाहते हैं। समय के सुप्रबंधन का फल प्राप्त होता है तो कुछ समय बाद हमको पूरी प्रविधि याद रहे न रहे, पर उसकी मुख्य छवि जेहन में बस जाती है। उसकी यदा-कदा स्मृति ही हमें पुलकित करती है, उत्साहित करती है, प्रेरित करती है। जीवन में जब भी हम फिर कभी किसी लक्ष्य के लिए कटिबद्ध होते हैं तो यह रुका या ठहरा हुआ समय हमारी बहुत मदद करता है। हमें पुराने अनुभव से सिखाता है। समय प्रबंधन की दक्षता देता है। यही कारण है कि अनुभव हमारा समय बचाता है। कामों को स्वत: ठीक करने की सम्पादन-दक्षता प्रदान करता है। साधन संसाधन के स्तर पर भी नई समझ विकसित करता है। नई तकनीक के प्रयोगों के प्रति भी उत्सुक तथा संवेदनशील बनाता है। यदि समय इस रूप में न ठहरता तो हमारे पास पूर्वजों की स्मृतियां, उनके संस्मरण और तमाम प्रेरणास्पद क्रियाकलाप सुरक्षित नहीं होते। कभी फिल्म के माध्यम से या किसी भी तकनीक के जरिये इस ठहरे हुए समय से मिलते हैं तो उसी के रंग में पूरे रंग जाते हैं। बचपन को जीवन की नींव और रीढ़ माना जाता है, क्योंकि तब सीखा गया अनुशासन आजीवन काम आता है। अपनाए गए गुण जीवन भर साथ देते हैं। इसीलिए कहते हैं न पके हांडे पर मिट्टी नहीं चढ़ती। सीखने की प्रक्रिया कम समय, कम मेहनत के बचपन में आसानी से सम्पादित की जा सकती है। इसीलिए ऐसा समय हमारे जीवन में काफी ठहरा हुआ तथा अमूल्य धरोहर बन जाता है। बड़े लोगों या महान लोगों के बाद की यही घटनाएं उनका व्यक्तित्व और समाज की देन होती है। इनसे हम अपने जीवन के समय को भी ठहरने लायक बना सकते हैं। यदि किसी संस्थान का प्रभारी समय पर आए, अपने कक्ष के लोगों को बुलाने की बजाय कार्यालय के अन्य क्षेत्रों में भी अपना प्रवेश रखे तो उसी दिन से इन क्षेत्रों के लोगों का व्यवहार जिम्मेदारी पूर्ण हो जाएगा। शिकायतें और उनके लिए की गई मीटिंग आदि सबका समय बचेगा। अमूमन उच्चस्थों की जी हुजूरी और कहीं जिम्मेदारी न बढ़ जाए या मेरे प्रति सम्मान भाव कम न हो पाए, इस कारण ऐसा हो नहीं पाता। जब हमारे पास खूब समय हो या हम उसे योजनाबद्ध रूप से आर्थिक कामों में लगाएं तो भी हमें समय ठहरा हुआ प्रतीत होता है। दिल्ली या महानगरों में आवाजाही में ही समय का बहुत भाग चला जाता है या समाप्त हो जाता है। छोटे शहर में कितने ही काम करने के बाद भी मेरे पास समय बच ही जाता था। आज भी मुझे ऐसा लगता है, जैसे राजस्थान में दिन के घंटे दिल्ली के दिन के घंटों से अधिक होते हों। कई बार हमें लगता है हम जब अपने आप में होते हैं तो भी समय हमें ठहरा हुआ लगता है, क्योंकि उस समय हमारे सम्मुख हम और हमारे लक्ष्य भर होते हैं। बहुत देर मौज-मस्ती, घूमा-मस्ती, तफरीह तो की जा सकती है, पर चिन्तनशील रहना कठिन है, इसलिए समय की इफरात लगती है। इतिहास को हम ठहरे हुए समय के सर्वाधिक सशक्त पक्ष के रूप में देख सकते हैं। यदि यह विभिन्न किताबों, हस्तलेखों, पाण्डुलिपियों, शिलालेखों, विभिन्न सभ्यता-संस्कृति के द्वारा हमें जानने-समझने को नहीं मिलता तो हम जो हैं, उसी तरक्की पर बौरा रहे होते। जो पहले था, उसी ने तो हमें उससे आगे की तरक्की पर बढ़ने की चेतना पैदा की। इतिहास हमें यह भी बताता है कि हमने पूर्व में कौन-कौन सी गलतियां कीं, जिन्हें हम फिर से न करें तो वैसी करारी हार या हताशा तथा असफलता से बच सकते हैं। इतिहास आज भी दुनिया के लिए महत्त्वपूर्ण है। वह मानव सभ्यता और संस्कृति का खाका है। हमारे लिए मापक और पैमाना भी है। यदि नेपोलियन, मुसोलिनी, हिटलर और ऐसे ही तमाम नायकों-खलनायकों की असफलता को न जानते तो उनकी सफलता का पथ और महत्त्व भी नहीं जान पाते। कालिदास जिस डाल पर बैठे थे, उसे ही काट रहे थे, यह बात किसी भी जड़मति में कालिदास बनने की प्रेरणा संचारती है, वरना व्यक्ति अपने को मूर्ख मान कर हाथ पर हाथ धरे ही बैठा रह जाएगा। यह ठहरा हुआ समय हमें चलायमान करता है। हमें अपने पूर्वजों की उपलब्धियों और असफलताओं से रू-ब-रू कराता है। हमें कांटों को हटाने-बुहारने के तरीके बताता है। इन्हें हटाये जाने के परिणाम भी बताता है। इस तरह प्रयोग या खुद ही हर काम को कर-कर के समय जाया करने की आदत सुधार कर हमारा बहुत समय बचाता है। ठहरा हुआ समय व्यक्ति की दैहिक मौजूदगी पर हावी होता है। व्यक्ति को अमरत्व दे देता है। बेगम अख्तर आज जिन्दा नहीं हैं, पर उनकी आवाज जिन्दा है, उनके स्वर जिन्दा हैं, इसलिए उनका न होना भी होने ही जितना प्रभावी है। समय को ठहराने के लिए लोग यात्रा, संस्मरण, रिपोर्ताज और ऐसी ही अन्य विधाओं का आश्रय लेते हैं। ऐसे समय को याद करने के लिए बार-बार सोच-विचार नहीं करना पड़ता। न ही उसके बारे में ज्यादा दिमाग पर जोर ही देना पड़ता है। कुछ लोग नियमित डायरी लेखन करते हैं। उसमें वे समय के साथ-साथ जैसे जीवन को ही संजो कर रख लेते हैं। गांधी आज भी प्रासंगिक हैं, यह उनके और लोगों के इस ठहरे हुए समय के स्त्रोत से ही पता चलता है। ठहरा हुआ समय यानी सर्वाधिक, सशक्त, मूल्यवान, महत्त्वपूर्ण समय इकाई। प्रकाश स्तम्भ जैसा। युगों-युगों के लिए महत्त्वपूर्ण पूंजीभूत। समय को ठहरा लें पर खुद न ठहरें, यही इसे ठहराने का टिकाऊ मूलमंत्र है।
यदि हम भी समय को ठहराना चाहते हैं तो हमें समय के समुचित प्रबंधन से उपलब्धि काल बनाना होगा। यह रुका हुआ समय बहुत सशक्त होता है। हमें बहुत कुछ चिंतन के लिए तैयार करता है। हमें प्रेरित करता है। टाटा कैसे भारत रत्न बने, बिल गेट्स कैसे दुनिया के अमीर व्यक्ति बने, यह सब ठहरा हुआ समय बताता है। तो हर कोई समय को वैसे ही ठहराने और बांहों में बांधने को आकुल-व्याकुल हो जाता है।
(डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित रेखा व्यास की पुस्तक ‘टाइम मैनेजमेंट’ से साभार,हिंदुस्तान,दिल्ली,20.7.2010)
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20 जुलाई 2010
क्या सचमुच समय ठहर जाता है?
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