राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने स्कूलों में बच्चों के साथ हिंसा व शारीरिक दंड देने के मामले में बेहद कड़ा रुख अख्तियार करते हुए रौवनजीत रावला आत्महत्या मामले में कोलकाता के ला मार्टिनियर स्कूल के प्रधानाचार्य व उप प्रधानाचार्य को बर्खास्त करने व संबंधित दोषी शिक्षकों की वेतनवृद्धि रोकने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने इस मामले में स्कूल प्रबंधन की जबावदेही भी तय की है और शिक्षा के अधिकार के तहत अध्यापन प्रक्रिया व शिक्षकों के सेवा नियमों की समीक्षा करने को भी कहा है। आठवीं कक्षा के छात्र रावला ने इस साल फरवरी माह में स्कूल में शारीरिक दंड व प्रताड़ना के बाद आत्महत्या कर ली थी। बाद में रावला के पिता की शिकायत पर आयोग ने एक जांच समिति गठित की थी, जिसने बीते 22 जून को अपनी रिपोर्ट दे दी थी। इस रिपोर्ट पर व्यापक विचार विमर्श के बाद आयोग ने स्कूल प्रबंधन, राज्य सरकार व केंद्र सरकार के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने के लिए सिफारिशें की हैं। आयोग ने पूरे मामले में प्रधानाचार्य व उप प्रधानाचार्य को दोषी करार देते हुए उन्हें पद से बर्खास्त करने की सिफारिश की है, और संबंधित शिक्षकों की वेतनवृद्धि रोकने को कहा है। आयोग ने स्कूल प्रबंधन की भी जबावदेही तय करते हुए कहा कि स्कूल का वातावरण तय करना व बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करना उसका भी काम है। आयोग ने राज्य सरकार को भी कहा है कि शिक्षा के अधिकार की धारा 17 के तहत सभी तरह के शारीरिक दंड पर रोक व ऐसा करने पर कार्रवाई का प्रावधान है। राज्यों को इस पर अमल के लिए अपने यहां जरूरी दिशानिर्देश बनाने व उन्हें जारी करना चाहिए। अनुशासन व हिंसा संबंधी सभी मामले छात्र, शिक्षक, स्कूल प्रबंधन व अभिभावकों को मिलकर तय किए जाने चाहिए। आयोग ने केंद्र सरकार की भूमिका के बारे में भी कहा है कि उसे शिक्षा के अधिकार के तहत सभी तरह की शारीरिक प्रताड़ना व हिंसा को रोकने का व्यापक प्रचार प्रसार करना चाहिए। शिक्षा का अधिकार कानून की धारा 17 पर अमल सुनिश्चित करने के लिए नियम भी बनाने चाहिए और उन्हें राज्यों में लागू कराने के लिए प्रयास करने चाहिए(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,20.7.2010)।
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