पब्लिक स्कूलों की बराबरी का सपना पाले दिल्ली के सरकारी स्कूलों की पढ़ाई अभी स्वर-व्यंजनों में ही उलझी हुई है। यहां आठवीं के छात्रों को अ आ इ ई व साधारण जोड़-घटाव सिखाकर पब्लिक स्कूलों के त्रिकोणमितीय स्तर को पकड़ने का दावा किया जा रहा है। शिक्षाविदों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में गिरते शिक्षा स्तर का कारण उसकी नीतियां हैं। उनके अनुसार, सरकार द्वारा आठवीं तक छात्रों को परीक्षा में पास करने की अनिवार्यता के चलते पढ़ाई को लेकर गंभीरता कम हो रही है। दरअसल इन दिनों राजकीय स्कूलों में पांचवी से आठवीं तक के छात्रों को मिनिमम लेवल लर्निग प्रोग्राम के तहत प्राथमिक स्तर की शिक्षा दी जा रही है। इसमें अ आ इ ई, ए बी सी डी व सरल जोड़-घटाव जैसी बुनियादी शिक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है। इसे देख सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजधानी के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर किस हद तक गिर गया है। इस बाबत शिक्षा निदेशालय ने बाकायदा सकुर्लर जारी कर निर्देश दिया था। इससे पहले सर्वे कराकर विभिन्न विषयों में कमजोर छात्रों की पहचान की गई थी। अब मिनिमम लेवल लर्निग प्रोग्राम के तहत इन छात्रों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा दी जा रही है। इसके तहत पहले माह में अंग्रेजी के अक्षरों व हिंदी की वर्णमाला का ज्ञान देना आवश्यक है। मिनिमम लेवल लर्निग प्रोग्राम का टेस्ट पास किए बिना छात्रों को अगली कक्षा में प्रवेश नहीं दिया जाता। सरकारी स्कूलों में आठवीं तक के छात्रों की यह स्थिति शिक्षा निदेशालय के नियमों के चलते हुई है। शिक्षाविदों का मानना है कि आठवीं तक के छात्रों में अब फेल होने का भय खत्म हो गया है। सरकार ने आठवीं तक के छात्रों को अनिवार्य रूप से पास होने का अधिकार दे दिया। अब छात्रों को लगता है कि जब पास हो जाएंगे, फिर पढ़कर क्या करें। हालांकि नवीं कक्षा में उनका सामना टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं वाली गणित से होने पर छात्रों को पसीना आने लगता है। इस बारे में शिक्षा विभाग के नोडल अधिकारी सीएस यादव का कहना है कि एक माह तक मिनिमम लेवल लर्निग प्रोग्राम चलाने का निर्देश था। छात्रों की बौद्धिक जांच के बाद छात्रों में अलग-अलग स्तर की कमियां देखी गई। इसे दूर करने के लिए विभिन्न स्तर पर कक्षाएं चलाई जा रही हैं(जितेन्द्र सिंह,दैनिक जागरण,दिल्ली,28.7.2010)।
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