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21 जुलाई 2010

निजी कंपनी से रैगिंग की निगरानी

बीते साल रैगिंग के चलते हिमाचल प्रदेश के एक संस्थान के छात्र अमन काचरू की मौत ने भले ही पूरे देश को झकझोर दिया हो, लेकिन केंद्र सरकार का दिल ज्यादा नहीं पसीजा। शायद यही वजह है कि उसने उस पिता के दर्द और रैगिंग के खिलाफ जूझने की उसके हौसले को भी नजरअंदाज कर दिया, जिसने रैगिंग में अपने बेटे को ही खो दिया। इतना ही नहीं, उस मामले के चलते रैगिंग की मॉनीटरिंग के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी लगभग एक किनारे पड़ा रहा और अब सरकार को उसकी याद भी आई तो वह एक निजी कंपनी का सहारा लेने जा रही है। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर अमल का अब ख्याल आया है, जिसमें बीते साल मार्च में टांडा (हिमाचल) के एक कालेज में मेडिकल प्रथम वर्ष के छात्र अमन काचरू की रैगिंग के चलते मौत मामले पर कोर्ट ने मई महीने में सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग की मानीटरिंग के लिए तत्काल किसी एजेंसी को नियुक्त करने को कहा था। उस आदेश की रोशनी में सरकार ने अपनी ही एक संस्था एडूसिल को रैगिंग की मॉनीटरिंग के लिए एजेंसी की तलाश करने को कहा था। बताते हैं कि एडूसिल की तलाश पूरी होने के बाद सरकार अब एक निजी कंपनी को एक साल के लिए मॉनीटरिंग का जिम्मा देने जा रही है। इसके लिए मंत्रालय व उस कंपनी के बीच जल्द ही करार होने जा रहा है। जबकि रैगिंग के चलते अपने बेटे अमन काचरू को गवां देने वाले राजेंद्र काचरू के आवेदन को दरकिनार कर दिया गया है। बताते हैं कि रैगिंग से बेटे अमन की मौत के बाद राजेंद्र काचरू ने रैगिंग के खिलाफ अभियान चलाने का मन बना लिया है। इसके लिए उन्होंने दो-तीन गैर सरकारी संगठनों को साथ लेकर अमन सत्या फाउंडेशन नाम से एक संस्था भी बना ली है। सूत्रों के मुताबिक देश भर में रैगिंग की मॉनीटरिंग के लिए एजेंसी की तलाश के दौरान अमन सत्या फाउंडेशन ने भी आवेदन किया था, लेकिन उसे इसके काबिल नहीं पाया गया। जबकि एक निजी कंपनी सरकार के मानकों पर खरी उतर गई। गौरतलब है कि अमन काचरू की मौत मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने रैगिंग की शिकायत के लिए एक हेल्पलाइन जरूर शुरू कर दी थी, लेकिन मॉनीटरिंग के लिए एजेंसी के चयन में उसे एक साल से ज्यादा का समय लग गया(राजकेश्वर सिंह,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,21.7.2010)।

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