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20 जुलाई 2010

स्कूलों में गरीबों का दाखिला होगा आसान

निजी स्कूलों की 25 फीसदी सीटों पर गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के दाखिले की जटिलताओं से निपटने के लिए केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद ने समिति गठित करने का फैसला किया है। बच्चों तो नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत निजी स्कूलों में पड़ोस के गरीब बच्चों के प्रवेश की अड़चनों को दूर करने के लिए यह कवायद की जा रही है। अधिनियम की धारा 12(1)(सी) के मुताबिक, निजी स्कूलों को कक्षा एक की न्यूनतम 25 फीसदी सीटों पर पड़ोस में रहने वाले समाज के दुर्बल व वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश देना होगा। उन्हें कक्षा आठ तक नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा देनी होगी। अधिनियम की धारा 12(2) में कहा गया है कि निजी स्कूलों को ऐसे बच्चों की पढ़ाई पर आने वाले खर्च की प्रतिपूर्ति सरकार करेगी। सरकार के निजी स्कूलों को प्रतिपूर्ति राज्य द्वारा प्रति बच्चे पर वहन किये जाने वाले खर्च या बच्चों से ली जाने वाली वास्तविक धनराशि में से जो भी कम हो, के बराबर की जाएगी। केंद्र सरकार ने बीती पहली अप्रैल से देश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम भले ही लागू कर दिया हो लेकिन इन धाराओं के तहत गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों के लिए पड़ोस के निजी स्कूलों में 25 फीसदी आरक्षण, उनमें बच्चों की भर्ती, आदि को लेकर कोई नीति तय नहीं हुई है। राज्य सरकार का अनुमान है इन प्रावधानों के अमल में आने पर उसे निजी स्कूलों को तकरीबन 20 लाख गरीब बच्चों के पढ़ाई के खर्च की भरपाई करनी पड़ सकती है। इसकी प्रतिपूर्ति के रूप में राज्य सरकार को हर साल लगभग 3,000 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। शिक्षाविदों का मानना है कि इन प्रावधानों को लागू करने में विवादों की भरपूर गुंजाइश है। निजी स्कूलों में वंचित वर्ग और गरीब तबके के बच्चों को प्रवेश पहले आओ, पहले पाओ की तर्ज पर दिया जाएगा या किसी अन्य माध्यम से, यह स्पष्ट नहीं है। यह समस्या इसलिए भी जटिल है क्योंकि अधिनियम के तहत किसी बच्चे को स्कूल में प्रवेश देने से रोका नहीं जा सकता। यह भी आशंका जताई जा रही है कि गली-कूचों में कुकुरमुत्ते की तरह पनप रहे दोयम दर्जे के निजी स्कूल फर्जी तरह से अपने यहां गरीब बच्चों का पंजीकरण दिखाकर सरकार से पैसे ऐठेंगे। शिक्षाविदों ने यह भी सवाल उठाया है कि राज्य तो सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के नाम पर सिर्फ शिक्षकों का वेतन देता है, बाकी के खर्चों का क्या होगा? अधिनियम इस बिंदु पर भी मौन है कि जब शिक्षा नि:शुल्क होगी तो क्या गरीब बच्चों की पाठ्यपुस्तकों, यूनिफार्म और उनके आने-जाने का खर्च भी क्या स्कूल वहन करेगा। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की अध्यक्षता में बीती 19 जून नयी दिल्ली में हुई केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने राज्यों को सूचित किया है कि इन जटिलताओं पर चर्चा कर उनका निराकरण करने के लिए केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद ने एक कमेटी गठित करने का फैसला किया है ताकि अगले शैक्षिक सत्र से अधिनियम के इन प्रावधानों पर अमल किया जा सके(राजीव दीक्षित,दैनिक जागरण,लखनऊ,20.7.2010)।

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