फादर कामिल बुल्के एक ऐसा नाम है जिस पर न केवल काथलिक कलीसिया स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती है, बल्कि पूरा भारत उनक विद्वता की दाद देता है। जब लोग अपनी भाषा को तवज्जो नहीं देते, वैसे में फादर बुल्के ने हिन्दी और संस्कृत को चुन कर सबको अचंभित कर दिया था। आज भी पुरुलिया रोड स्थित शोध संस्थान उनके नाम को जीवंत बनाए हुए है। हिन्दी में बाईबल का नया विधान उन्हीं की देन है, जिसका अनुवाद उन्होंने 1977 में किया था। हिन्दी की सेवाओं के लिए फादर कामिल बुल्के को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। फादर कमिल बुल्के की अंतिम कृति रामचरितमानस कौमुदी है। अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में कामिल बुल्के का रामायण पर दिया गया स्वागत भाषण उनके जीवन में एक नया मोड़ था। बुल्के बेल्जियम के राम्स्कपेल्ल नामक एक छोटे से गांव में जन्मे थे। जब वे लुवेन विश्र्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग में बीएससी की तैयारी कर रहे थे, उसी समय अचानक परीक्षा समाप्त करते ही भारत में मिशनरी बन कर काम करने की तीव्र इच्छा ने उन्हें येशु संघ में सम्मिलित होने को विवश किया। 1930 में वे येशु संघ में सम्मिलित हुए। 1935 के अन्त में वे भारत आए और भारत में सबसे पहले कुछ दिन दार्जिलिंग में रहे। उसके बाद वे गुमला में पढ़ाने के लिए भेजे गए। वहीं उन्होंने हिन्दी का अध्ययन शुरू किया। इससे पहले वे लातिन ,ग्रीक, जर्मन, फ्रेंच, फ्लेमिश भाषाओं पर अपना अधिकार जमा चुके थे। भारत आते ही हिन्दी और संस्कृत पर अपना अधिकार जमाने की इच्छा उनके स्वभाव के अनुकूल ही था। 1938 में बनारस युनिवर्सिटी में ही हिन्दी का अध्ययन शुरू किया। 1939 में उन्होंने कर्सियोंग जाकर ईश शास्त्रीय अध्ययन आरंभ किया, जिसके फलस्वरूप उन्होंने द सेवियर चारों सुसमाचारों का समन्वय रचा। इसके अनेक संस्करण निकले। बाद में उन्होंने उनका हिन्दी अनुवाद भी किया(जसिन्ता केरकेट्टा, दैनिक जागरण,रांची,2.7.2010)।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।