हाल ही में उच्चतम न्यायालय द्वारा कर्नाटक और तमिलनाडु सरकार के शिक्षण संस्थानों तथा विभिन्न सेवा क्षेत्रों में आरक्षण से जुड़े मुद्दे पर विस्तारित निर्णय देने से देश में बहस और तेज हो गई है। इस बहस का पहला मुद्दा कर्नाटक सरकार से जुड़ा है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल और कॉलेजों के साथ-साथ नौकरियों में पचास फीसदी से अधिक आरक्षण देने वाले कानून पर पुनर्विचार करने को कहा है। ज्ञातव्य है कि 11 नवंबर 1994 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की नौकरियों में 73 फीसदी आरक्षण के फैसले पर रोक लगाई थी। तभी से इस पर याचिका भी लंबित है। मुख्य न्यायाधीश एचएस कपाडि़या और न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन तथा न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा है कि राज्य सरकार आरक्षण कानून लागू करते समय पचास फीसदी आरक्षण के मानकों का पालन करे। उस पीठ का यह भी मत है कि राज्य सरकार के पास यदि पचास फीसदी की सीमा से अधिक आरक्षण को जायज ठहराने के समुचित आंकड़े और विधिसम्मत तर्क हैं तो वह इससे ज्यादा सीमा तय करे। यहां खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से यह भी कहा है कि यदि राज्य सरकार इस बारे में कोई निर्णय नहीं लेती है तो वे पुन: सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। आरक्षण के दूसरे मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के मामले में वहां 69 फीसदी आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका को जांच के लिए राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को भेज दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि पचास फीसदी से अधिक आरक्षण के मामले में राज्य सरकार आयोग के समक्ष समुचित आंकड़ों के साथ अपने तर्क प्रस्तुत करे। साथ ही आयोग का यह भी दायित्व है कि वह उन आंकड़ों की विधिवत जांच करे। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का उल्लेखनीय पहलू यह है कि उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को पूर्व से जारी 69 फीसदी आरक्षण को आगे एक वर्ष और जारी रखने की अनुमति भी प्रदान कर दी है। इस संदर्भ में तमिलनाडु सरकार ने भी राज्य के ऐतिहासिक व सामाजिक परिदृश्य के विषय में तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा है कि 1981 में राज्य में आरक्षण की सीमा 68 फीसदी निर्धारित की गई थी। इसके बाद 1990 में यह 69 फीसदी कर दी गई। उन्होंने तमिलनाडु राज्य की आबादी के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा है कि यहां अनुसूचित जाति/जनजाति तथा पिछड़ों की कुल आबादी 88 फीसदी है, जबकि उनके लिए आरक्षण मात्र 69 फीसदी ही प्रदान किया जा रहा है। ज्ञातव्य है कि अब देश में तमिलनाडु अकेला ऐसा राज्य हो गया है, जहां स्कूल, कॉलेजों तथा नौकरियों में आरक्षण कोटा 50 फीसदी को पार कर गया है। उड़ीसा और कर्नाटक राज्य भी अपने-अपने राज्यों में आरक्षण की इसी श्रेणी में आते हैं। मगर वहां कोर्ट ने 50 फीसदी से अधिक आरक्षण देने पर रोक लगा रखी है। हालांकि सामाजिक विषमताओं और मानवीय भेदभावों को दूर करने के लिए आरक्षण का उपयोग भारत में बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही हो रहा है। दक्षिण राज्यों में तो यह आरक्षण व्यवस्था 1921 से ही लागू है, लेकिन संविधान निर्माताओं ने भारत के समाज को समतामूलक बनाने के लिए इसे पूरे देश में लागू किया। परिणामत: अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू की गई, जबकि अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण की व्यवस्था का कार्य संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत बनाए जाने वाले आयोग को सौंप दिया गया। पचास के दशक में काका कालेलकर की अध्यक्षता में बने उस आयोग ने पिछड़े वर्गो को 70 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की थी। उस समय कांग्रेस के बड़े नेता आरक्षण में इस ढांचे से भयाक्रांत हो गए। तत्पश्चात विंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों को भी कांग्रेस ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया, लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में रामो-वामो की सरकार बनने पर आरक्षण की इस व्यवस्था को लागू कर दिया गया। मंडल कमीशन की इस रिपोर्ट से पूरे देश का युवा वर्ग बौखला उठा। तमाम छात्रों ने आत्मदाह किया, जिससे राष्ट्र की नूतन मेधा के सामने एक भारी संकट खड़ा हो गया। साथ ही सामाजिक समरसता तथा रचनात्मक प्रतिभा पर भी असुरक्षा के बादल मंडराने लगे। दरअसल, स्वतंत्रता के बाद यह संकल्पना उभर कर सामने आई थी कि स्वतंत्र देश में एक ऐसा समाज विकसित होगा, जिसमें जातियों के बीच कोई ऊंच-नीच का संस्तरण नहीं होगा, कोई अस्पृश्यता नहीं होगी, कोई सामाजिक-आर्थिक विषमता नहीं होगी, देश और समाज के स्तर पर जाति के नाम पर कोई भेदभाव नहीं होगा। अंतत: देश में सामाजिक विकास की ऐसी नव संरचना विकसित होगी, जहां जाति से जुड़े दुराग्रह और अस्मिताएं भी नष्ट हो जाएंगी। लेकिन 62 वर्षो के बाद भी आरक्षण से जुड़ा यह संदर्भित विषय आज भी उतना ही ज्वलंत बना हुआ है। इसी संदर्भ में यह प्रश्न भी बार-बार उठता है कि क्या हम आरक्षण की इस अतिवादी व्यवस्था से ऐसे प्राकल्पित समाज के थोड़ा भी निकट पहुंच पाए हैं? निश्चित ही आरक्षण व्यवस्था परिवर्तन और सामाजिक परिवर्तन का कारगर माध्यम है। समाज की दबी-कुचली जातियों और पिछड़े वर्गो को आरक्षण दिए जाने का समाज कभी भी विरोधी नहीं रहा है, लेकिन जब यह आरक्षण सत्ता प्राप्त करने का साधन बनने लगता है तो समाज के समरस बनने की संकल्पनाएं ध्वस्त हो जाती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि विगत 62 वर्षो में आरक्षण ने समाज के दबे-कुचले और कमजोर वर्गो को सामाजिक संस्करण की व्यवस्था में उन्हें उच्च परिस्थिति प्राप्त कराने के साथ-साथ राजनीति-आर्थिक शक्ति भी प्रदान की है, लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है कि दूसरी ओर इस आरक्षण में अनारक्षित जातियों में एक गुस्सैल आक्रोश का बीजारोपण भी किया है। इसी आरक्षण ने अनारक्षित जातियों के साथ-साथ आरक्षित जातियों के बीच भी जातीय खाई को गहरा करते हुए उन्हें जातीय विद्वेष की हिंसा तक पहुंचाया है। इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आरक्षित जातियों के बीच आरक्षण से ही समाज के विभिन्न वर्गो का द्विभाजन हुआ है। एक ओर इस आरक्षण से पुष्पित-पल्लवित होने वाला क्रीमी लेयर वर्ग है, तो दूसरी ओर वह कमजोर वर्ग, जो देश की आजादी के 62 वर्षो बाद भी समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ा है। आरक्षण व्यवस्था से जुड़े साहित्य के अवलोकन व शोध बताते हैं कि देश में अभी तक ऐसा कोई शोध कार्य नहीं हुआ, जो यह बता सके कि इसने भारतीय समाज को समरस, सामाजिक दृष्टि से न्यायपूर्ण तथा अंतत: जातिविहीन बनाने में कितनी मदद की? क्या समाज के आखिरी छोर पर रहने वाले दबे-कुचले लोगों तक इस आरक्षण का प्रभाव पहुंच पाया? असल बात यह है कि आरक्षण से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों का आज भी वही मूल्य है, जिनका देश के संविधान समर्पण के समय भी आकलन किया गया था। आज जब हम संपूर्ण आरक्षण व्यवस्था का मूल्यांकन करते हैं तो यह सच उभकर सामने आता है कि आरक्षण अब सामाजिक विकास की दौड़ में पीछे छूट गई जातियों के उत्थान का कम, बल्कि प्रगतिशीलता के कृतिम ढांचे की आड़ में सत्ता की कुर्सी प्राप्त करने का साधन अधिक बन चुका है। याद होगा, जब क्रीमी लेयर के तर्क को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी तो उसमें कोर्ट का सशक्त तर्क था कि आरक्षित जातियों में ही उन तबकों को इस आरक्षण से बाहर किया जाना चाहिए, जो शैक्षिक और आर्थिक आधार पर समाज में ऊपर का स्तर प्राप्त कर चुके हैं। वह इसलिए ताकि सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक रूप से पिछड़ जाने वाले वर्गो को भी आरक्षण का उद्देश्यपूर्ण लाभ प्राप्त हो सके। कोर्ट के इस सशक्त तर्क का विरोध करने का साहस तो किसी में नहीं था, लेकिन सत्तावादी राजनीति करने वालों के चिंतन का राष्ट्रव्यापी स्तर न होने से आरक्षण के आर्थिक आधार से जुड़ी संकल्पना दम तोड़ गई। इतिहास साक्षी है कि दलित जातियों के राजनीतिक और आर्थिक उत्थान के सबसे बड़े पक्षकार भारत रत्न बाबा भीमराव आंबेडकर दलितों के लिए आरक्षण के पक्ष में कभी नहीं थे, लेकिन जब उन पर दवाब डाला गया तो वे इस शर्त पर सहमत हुए कि 15 वर्ष की निश्चित समयावधि के बाद इस आरक्षण व्यवस्था का अंत कर दिया जाएगा, लेकिन अब तो यह वर्तमान पीढ़ी भी स्वयं साक्षी है कि कैसे निश्चित वोट बैंक की खातिर राजनीतिक दलों ने इस आरक्षण व्यवस्था की समयावधि का विस्तार करते-करते इसे अनंतकालीन बना दिया है। माननीय उच्चतम न्यायालय के कर्नाटक व तमिलनाडु सरकार को वहां की शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में पूर्व में दी जा रही पचास फीसदी से अधिक आरक्षण व्यवस्था के विषय में दिए गए निर्णय से राष्ट्र का कोई विरोध नहीं है, लेकिन इससे राष्ट्रीय पटल पर कुछ चिंताएं अवश्य उभर रही हैं। उसमें प्रमुख चिंता का विषय यह है कि सरकारें इस पचास फीसदी से अधिक आरक्षण के संरक्षण के विषय में जो तर्क प्रस्तुत कर रही हैं, यदि भविष्य में इस विचार का संरक्षण किया जाता है तो राष्ट्र की सामाजिक समरसता की अवधारणा को बहुत बड़ा झटका लगेगा। यह भी कटु सच है कि यदि कर्नाटक, उड़ीसा और तमिलनाडु राज्यों की 69 फीसदी आरक्षण विस्तार के प्रतिमान की यह मांग अन्य प्रदेशों में भी उठती है तो निश्चित ही सामान्य वर्ग के युवा वर्गो के समक्ष अवसरों की समानता कमजोर पड़ेगी। साथ ही अवसरों की असमानता और वर्तमान के वैश्विक दौर की इच्छाओं के द्वंद्व के बीच नूतन संघर्षो के उभरने की भी आशंकाएं हैं(विशेष गुप्ता,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,27.7.2010)।
सारपूर्ण विश्लेषण !!
जवाब देंहटाएंसाथ ही अच्छा विवेचन।