मल्टीनेशनल कंपनियों के लुभावने पैकेज और कॉरपोरेट जगत में काम करने की चाहत ने युवाओं का रिसर्च की ओर रुझान कम कर दिया है। हर साल टेक्निकल और ट्रेडिशनल कोर्सेस की डिग्रियां लेकर निकल रहे स्टूडेंट्स में से बामुश्किल 10 फीसदी स्टूडेंट रिसर्च में जा रहे हैं। उनकी रुचि मैनेजमेंट के कोर्सेस में ज्यादा हो रही है। शिक्षा और उद्योग जगत से जुड़े लोग ऐसी स्थितियों को देश के तकनीकी विकास की राह का रोड़ा मानते हैं।
बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में करीब साढ़े चार हजार स्टूडेंट पढ़ते हैं। यहां पीजी कोर्सेस से लगभग एक हजार से ज्यादा स्टूडेंट पासआउट होते हैं लेकिन इनमें से रिसर्च के लिए अप्लाई करते हैं बामुश्किल ४क् से ५क्। इसी तरह राजीव गांधी टेक्निकल यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स लगभग १८५क् हैं। पीजी कोर्सेस से हर साल लगभग 174 स्टूडेंट्स पासआउट होने हैं। इस पर रिसर्च की ओर जाते हैं महज 6-7 फीसदी। ये स्थितियां दर्शाती हैं कि स्टूडेंट्स मंे रिसर्च के प्रति रुचि कम हो गई है।
सैटेल होना होती है प्राथमिकता
टेक्निकल कोर्सेस के स्टूडेंट हों या ट्रेडिशनल कोर्सेस के, रिसर्च से तौबा ही करते हैं। टेक्निकल कोर्सेस के स्टूडेंट्स अच्छे पैकेज क ी नौकरियां तलाश कर जल्द से जल्द सैटल होने में विश्वास रखते हैं। ट्रेडिशनल कोर्सेस के स्टूडेंट्स भी कोई छोटा-मोटा प्रोफेशनल कोर्स कर नौकरी या बिजनेस करना ज्यादा पसंद करते हैं। रिसर्च में जो इक्का-दुक्का लोग जाते हैं उनमें भी ज्यादातर ऐवरेज ही होते हैं। जबकि उद्योग, शिक्षा और रिसर्च जगत के विशेषज्ञों के मुताबिक रिसर्च में टॉप ब्रेन का आना बेहद जरूरी है।
रिसर्च में न जाने के पीछे मुख्य वजह स्टूडेंट्स में जल्दी सैटल होने की चाह है। बीई करने के बाद बतौर मैकेनिकल इंजीनियर एक मल्टीनेशनल कंपनी के कैंपस में सिलेक्ट हुई भावना सिंह कहती हैं, पहले ही पढ़ाई में काफ ी पैसा खर्च हो चुका है। ऐसे में आगे की पढ़ाई करना और रिसर्च करना संभव नहीं हो पाता। वहीं रिसर्च वर्क करने वाले लोगों को मैनेजमेंट में काम करने या डिसीजन मेकिंग बॉडी में काम करने का मौका कम मिलता है। यह भी युवाओ में अरुचि क ा एक कारण है। बीई के बाद एमबीए कर रहे अर्पण खरे के मुताबिक रिसर्च में कई साल मेहनत करने के बाद भी मैनेजमेंट के क्षेत्र के लोगों के अंडर में काम करना पड़ता है। लिहाजा बेहतर है कि एमबीए कर मैनेजमेंट में ही करियर बनाया जाए। इस क्षेत्र में सैलरी पैकेज अच्छा मिलता है। साथ ही कम समय में कोई युवा तरक्की कर उच्च पदों को हासिल कर सकता है।
सरकारी नीतियां भी हैं जिम्मेदार
बीयूआईटी के स्टूडेंट एक्टिविटी सेल के हेड गौरव भगत क हते हैं कि रिसर्च के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए सरकार की नीतियां भी स्पष्ट नहीं है। ज्यादातर विभागों में रिसर्च के लिए सर्विस कंडीशन डिफाइन नहीं है। इससे जो लोग रिसर्च करते भी हैं, उन्हें प्रमोशन और बाकी सुविधाएं समय पर नहीं मिल पातीं। इसके अलावा सेासायटी और पैरेन्ट्स भी मल्टीनेशनल कंपनियों की नौकरियों को ज्यादा सम्मानजनक मानते हैं(दैनिक भास्कर,5.7.2010)।
बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में करीब साढ़े चार हजार स्टूडेंट पढ़ते हैं। यहां पीजी कोर्सेस से लगभग एक हजार से ज्यादा स्टूडेंट पासआउट होते हैं लेकिन इनमें से रिसर्च के लिए अप्लाई करते हैं बामुश्किल ४क् से ५क्। इसी तरह राजीव गांधी टेक्निकल यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स लगभग १८५क् हैं। पीजी कोर्सेस से हर साल लगभग 174 स्टूडेंट्स पासआउट होने हैं। इस पर रिसर्च की ओर जाते हैं महज 6-7 फीसदी। ये स्थितियां दर्शाती हैं कि स्टूडेंट्स मंे रिसर्च के प्रति रुचि कम हो गई है।
सैटेल होना होती है प्राथमिकता
टेक्निकल कोर्सेस के स्टूडेंट हों या ट्रेडिशनल कोर्सेस के, रिसर्च से तौबा ही करते हैं। टेक्निकल कोर्सेस के स्टूडेंट्स अच्छे पैकेज क ी नौकरियां तलाश कर जल्द से जल्द सैटल होने में विश्वास रखते हैं। ट्रेडिशनल कोर्सेस के स्टूडेंट्स भी कोई छोटा-मोटा प्रोफेशनल कोर्स कर नौकरी या बिजनेस करना ज्यादा पसंद करते हैं। रिसर्च में जो इक्का-दुक्का लोग जाते हैं उनमें भी ज्यादातर ऐवरेज ही होते हैं। जबकि उद्योग, शिक्षा और रिसर्च जगत के विशेषज्ञों के मुताबिक रिसर्च में टॉप ब्रेन का आना बेहद जरूरी है।
रिसर्च में न जाने के पीछे मुख्य वजह स्टूडेंट्स में जल्दी सैटल होने की चाह है। बीई करने के बाद बतौर मैकेनिकल इंजीनियर एक मल्टीनेशनल कंपनी के कैंपस में सिलेक्ट हुई भावना सिंह कहती हैं, पहले ही पढ़ाई में काफ ी पैसा खर्च हो चुका है। ऐसे में आगे की पढ़ाई करना और रिसर्च करना संभव नहीं हो पाता। वहीं रिसर्च वर्क करने वाले लोगों को मैनेजमेंट में काम करने या डिसीजन मेकिंग बॉडी में काम करने का मौका कम मिलता है। यह भी युवाओ में अरुचि क ा एक कारण है। बीई के बाद एमबीए कर रहे अर्पण खरे के मुताबिक रिसर्च में कई साल मेहनत करने के बाद भी मैनेजमेंट के क्षेत्र के लोगों के अंडर में काम करना पड़ता है। लिहाजा बेहतर है कि एमबीए कर मैनेजमेंट में ही करियर बनाया जाए। इस क्षेत्र में सैलरी पैकेज अच्छा मिलता है। साथ ही कम समय में कोई युवा तरक्की कर उच्च पदों को हासिल कर सकता है।
सरकारी नीतियां भी हैं जिम्मेदार
बीयूआईटी के स्टूडेंट एक्टिविटी सेल के हेड गौरव भगत क हते हैं कि रिसर्च के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए सरकार की नीतियां भी स्पष्ट नहीं है। ज्यादातर विभागों में रिसर्च के लिए सर्विस कंडीशन डिफाइन नहीं है। इससे जो लोग रिसर्च करते भी हैं, उन्हें प्रमोशन और बाकी सुविधाएं समय पर नहीं मिल पातीं। इसके अलावा सेासायटी और पैरेन्ट्स भी मल्टीनेशनल कंपनियों की नौकरियों को ज्यादा सम्मानजनक मानते हैं(दैनिक भास्कर,5.7.2010)।
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