मुख्य समाचारः

सम्पर्कःeduployment@gmail.com

19 जुलाई 2010

जजों का पुलिस वैरिफिकेशन जरूरी

एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को आदेश दिए हैं कि कोर्ट सभी जजों की नियुक्ति से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि उनका पुलिस वैरिफिकेशन हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला जज की नौकरी से निकाले जाने के मामले पर कर्नाटक हाईकोर्ट को चुनौती देने वाली एक याचिका के जवाब में दिया है। जस्टिस बी एस चौहान व जस्टिस स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ ने निर्देश दिया कि पारदर्शिता और निष्पक्ष न्याय देने के लिए सभी हाइकोर्ट को जजों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट बनाना आवश्यक है। खंडपीठ ने कहा कि यह चिंता की बात है, लेकिन हाईकोर्ट ही इस बारे में ठोस कार्रवाई करके इस तरह के मामलों को दूर रख सकते हैं। हाईकोर्ट को निर्देश दिए गए हैं कि वे सुनिश्चित करें कि न्यायिक प्रक्रिया में शामिल हर जज का पुलिस द्वारा वैरिफिकेशन किया गया हो। उल्लेखनीय है कि खाजिया मोहम्मद मुजामिल नामक एक शख्स ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे जज की नौकरी से इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि उसे इस पद के लिए अनुचित पाया गया था। खाजिया को 1996 में कर्नाटक उच्च न्यायालय में जज के तौर पर नियुक्त किया गया था, लेकिन तीन साल बाद ही उन्हें पद के लिए अयोग्य पाकर नौकरी से निकाल दिया गया था। खाजिया ने इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। रिकॉर्डो पर गौर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाइकोर्ट के उस निर्णय पर अफसोस जताया था जिसके तहत खाजिया पर गुंडागर्दी का मुकदमा होने के बावजूद उसे कोर्ट में नियुक्ति दी गई थी। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक खाजिया पर सांप्रदायिक हिंसा फैलाने और हत्या करने जैसे कई अपराधों में मुकदमा दर्ज था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्यत: इस तरह के अपराधों में लिप्त आरोपी को राज्य सरकार की सेवाओं व खासकर जज की पोस्ट पर नौकरी देने में सावधानी बरती जाती है। अदालत ने इस तरह की नियुक्तियों पर अफसोस जताते हुए कहा कि एक अपराधिक छवि वाले व्यक्ति का सेशन जज के पद पर कुछ सालों तक नियुक्त रहना बड़ी चिंता का विषय है(दैनिक जागरण,भोपाल संस्करण,19.7.2010)।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।